Why History Blames Nehru for Partition When He Fought Against जवाहरलाल नेहरू: जिस शख़्स ने सब कुछ लुटा दिया, इतिहास ने उसी को कठघरे में खड़ा कर दिया

Why History Blames Nehru for Partition When He Fought Against I जवाहरलाल नेहरू: जिस शख़्स ने सब कुछ लुटा दिया, इतिहास ने उसी को कठघरे में खड़ा कर दिया

Why History Blames Nehru for Partition When He Fought Against I जवाहरलाल नेहरू: जिस शख़्स ने सब कुछ लुटा दिया, इतिहास ने उसी को कठघरे में खड़ा कर दिया


किसी शाम चाय की दुकान पर बैठिए और बात 1947 तक पहुंच जाए, तो एक नाम बड़ी बेरहमी से उछाला जाता है जवाहरलाल नेहरू। "विभाजन इन्हीं की देन थी," "कश्मीर का रोग इन्हीं ने पाला," ऐसे जुमले हवा में तैरते रहते हैं, मानो पूरा इतिहास एक ही आदमी के कंधों पर लदा हो। लेखक लक्ष्मण राव की किताब ' The Philosopher Jawaharlal Nehru' पढ़ते हुए एक अजीब बेचैनी होती है यह बेचैनी इस बात की नहीं कि नेहरू perfect थे, बल्कि इस बात की कि जिस आदमी ने अपनी हर चीज़ मुल्क के नाम कर दी, उसी की कब्र पर हम सबसे ज़्यादा पत्थर फेंकते हैं। आइए, इस किताब के हवाले से उस दास्तां को फिर से खंगालते हैं बिना किसी पूर्वाग्रह के, सिर्फ़ तथ्यों की रोशनी में।

एक राजकुमार जिसने महल की चौखट लांघ दी

14 नवंबर 1889, इलाहाबाद। मोतीलाल नेहरू जैसे नामी Barister के घर जन्मे जवाहरलाल के हिस्से में वो सब कुछ था जो एक इंसान चाह सकता है दौलत, रुतबा, Europe की Education। हैरो स्कूल, कैम्ब्रिज का Trinity College, और London से वकालत की degree यह सफ़र किसी आम हिंदुस्तानी नौजवान का नहीं, एक ख़ानदानी शहज़ादे का था।

मगर 1912 में वतन लौटकर जब उन्होंने इलाहाबाद High court की चौखट पर वकालत शुरू की, तो जल्दी ही समझ गए कि कचहरी की फ़ाइलों में उनका दिल नहीं लगता। गांधी से मुलाक़ात ने ज़ेहन में जो चिंगारी सुलगाई, उसने आगे चलकर उन्हें अपनी पूरी दुनिया दांव पर लगाने पर मजबूर कर दिया। परिवार की ऐतिहासिक हवेली जिसे बाद के दौर में स्वराज भवन और आनंद भवन के नाम से जाना गया। आज़ादी की लड़ाई के लिए वक़्फ़ कर दी गई। पहले मोतीलाल नेहरू ने 1930 में पुरानी हवेली कांग्रेस को सौंपी, और बरसों बाद नई हवेली भी नेहरू परिवार की तरफ़ से राष्ट्र के नाम कर दी गई। यह सिर्फ़ ईंट-गारे का त्याग नहीं था, यह एक पूरी विरासत का बलिदान था।

इससे भी बड़ी क़ीमत उन्होंने अपनी उम्र देकर चुकाई। नौ साल से ज़्यादा वक़्त अंग्रेज़ों की जेलों की सलाखों के पीछे बीता। मगर इसी तन्हाई और अंधेरी कोठरी में बैठकर उन्होंने Discovery of India और Glimpses of World History जैसी किताबें रचीं। जेल जिस आदमी को तोड़ती है, नेहरू ने उसी जेल को क़लम की स्याही बना दिया।

जब मुल्क जल रहा था, नेहरू सड़कों पर थे

अगस्त 1947 की वो आग आज भी History के पन्नों को झुलसाती है। पंजाब जब सांप्रदायिक हिंसा की भट्टी में झोंका जा रहा था, नेहरू दफ़्तर की कुर्सी पर बैठकर रिपोर्टें नहीं पढ़ते रहे, वे ख़ुद लाहौर, अमृतसर और पटियाला की तबाह गलियों में उतर गए, लियाक़त अली ख़ान और सरदार बलदेव सिंह के साथ। एक नए, कंगाल हो चुके मुल्क के पास पैसा तक नहीं था, फिर भी उन्होंने शरणार्थियों के लिए एक सर्वोच्च समिति बनाई, एक Commissioner नियुक्त किया, और लुटे-पिटे परिवारों तक 5,000 रुपये की मदद, तंबू, राशन और ट्रेनों-बसों का इंतज़ाम पहुंचाया। यह किसी सत्ता-लोलुप नेता का काम नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान का काम था जिसके लिए हर शरणार्थी का दर्द अपना दर्द था।

1961 में जब वही आदमी UNO की महासभा के मंच पर खड़ा हुआ, तो दुनिया के बड़े-बड़े राजनेता उनकी अंग्रेज़ी की पकड़ और शांतिवादी सोच के आगे नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सके।

Myth 1: क्या नेहरू ने मुल्क बांटा?

अब आते हैं उस सवाल पर, जो चाय की दुकानों से लेकर TV debates तक सबसे ज़्यादा उछाला जाता है। सच यह है कि सांप्रदायिक खाई अंग्रेज़ों ने दशकों की "फूट डालो और राज करो" नीति से खोदी थी। Cabinet Mission और Cripps Proposal जैसी योजनाओं ने हालात को इस मुक़ाम तक पहुंचा दिया कि अखंडता बचाना लगभग नामुमकिन हो गया। मुहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two States Theory) पर अड़े रहे, और 1946 के Direct Action Day के ऐलान ने पूरे मुल्क को ख़ून से रंग दिया।

नेहरू और Congress आख़िरी दम तक अखंड भारत के पक्ष में डटे रहे। पर जब गली-गली में लाशें बिछने लगीं और मुल्क गृहयुद्ध के मुहाने पर खड़ा हो गया, तो करोड़ों बेगुनाहों की जान बचाने के लिए भारी मन से बंटवारे की शर्त क़बूल करनी पड़ी। नेहरू ने कभी इसे जीत की तरह नहीं देखा उनके लिए यह एक ऐसा ज़ख़्म था जो उम्र भर हरा रहा।

इस दौर की एक कम चर्चित घटना भी ग़ौर करने लायक़ है। 1 अप्रैल 1947 को गांधीजी ने ख़ुद Mountbatten के सामने एक अनोखा प्रस्ताव रखा था जिन्ना को अखंड भारत का प्रधानमंत्री बना दिया जाए, वे चाहें तो अपनी मर्ज़ी की कैबिनेट बनाएं, और कांग्रेस पूरे दिल से साथ देगी। गांधी को उम्मीद थी कि इससे जिन्ना की महत्वाकांक्षा शांत होगी और अलग पाकिस्तान की ज़िद टल जाएगी। मगर Congress working committee जिसमें नेहरू और पटेल दोनों शामिल थे ने इस प्रस्ताव को नामंज़ूर कर दिया, इस आशंका के साथ कि सत्ता से हटते ही Muslim league शासन में रोड़े अटकाएगी। यह गांधी का निजी दांव था, कांग्रेस की सामूहिक नीति नहीं, और यह भी साफ़ नहीं कि जिन्ना इसे गंभीरता से लेते भी या नहीं फिर भी यह वाक़या दिखाता है कि विभाजन की दास्तां किसी एक आदमी की ग़लती नहीं, बल्कि हर तरफ़ के मुश्किल और उलझे फ़ैसलों की एक लंबी ज़ंजीर थी।

Myth 2: गांधी का अनशन और "पाकिस्तान की मांग" एक ग़लतफ़हमी जो बार-बार दोहराई जाती है

यहां एक बात साफ़ कर देना ज़रूरी है, क्योंकि social media पर यह ग़लतफ़हमी बहुत आम है। लोग अक्सर कहते हैं कि गांधीजी "पाकिस्तान की मांग को लेकर" अनशन पर बैठे थे यानी जैसे वे ख़ुद विभाजन चाहते थे। हक़ीक़त इसके ठीक उलट है।

गांधीजी शुरू से आख़िर तक विभाजन के सख़्त ख़िलाफ़ थे। उनका आख़िरी अनशन जनवरी 1948 में हुआ यानी विभाजन हो चुकने के पांच महीने बाद। यह अनशन "पाकिस्तान बनाने" के लिए नहीं, बल्कि दो अलग-अलग वजहों से था: पहला, दिल्ली में भड़की हिंदू-मुस्लिम हिंसा को रोकना और दोनों तरफ़ की अल्पसंख्यक आबादी की हिफ़ाज़त सुनिश्चित करना; दूसरा, बंटवारे के वक़्त तय हुए उस समझौते को निभाना, जिसके तहत भारत को पाकिस्तान को उसके हिस्से के 55 करोड़ रुपये देने थे जो कश्मीर में घुसपैठ के बाद रोक दिए गए थे। गांधीजी का मानना था कि जो वादा किया गया है, उससे मुकरना ग़लत है, चाहे रिश्ते कितने भी कड़वे क्यों न हों।

यानी गांधी और नेहरू दोनों ही विभाजन के विरोधी थे; दोनों उन हालात के शिकार बने जो उन्होंने ख़ुद नहीं गढ़े थे। इस अनशन को "पाकिस्तान-समर्थक" बताना इतिहास के साथ नाइंसाफ़ी है।

कश्मीर के वो अड़तालीस घंटे

22 अक्तूबर 1947 पाकिस्तान की शह पर हज़ारों कबायली हमलावर जम्मू-कश्मीर पर टूट पड़े। मुज़फ़्फ़राबाद और बारामूला में लूट-खसोट और क़त्ल-ए-आम मचा, बिजलीघर तबाह कर पूरी वादी को अंधेरे में डुबो दिया गया। जब हमलावर श्रीनगर की दहलीज़ तक पहुंच गए, तो महाराजा हरि सिंह और वादी के सबसे लोकप्रिय नेता शेख़ अब्दुल्ला ने भारत सरकार से फ़ौजी मदद और भारतीय संघ में विलय की गुहार लगाई।

25-26 October को रक्षा समिति की बैठकों में मंथन हुआ, और 27 October की सुबह नेहरू ने बिना एक पल गंवाए भारतीय फ़ौज को हवाई जहाज़ों से श्रीनगर भेज दिया। यह Airlift इतिहास के सबसे तेज़ और साहसी फ़ैसलों में गिना जाता है। भारतीय थलसेना और वायुसेना ने श्रीनगर Airport पर क़ब्ज़ा जमाकर हमलावरों को खदेड़ा, और नेहरू ने महाराजा की रज़ामंदी से शेख़ अब्दुल्ला को कश्मीर का आपातकालीन प्रशासनिक मुखिया बनाया साथ ही यह वादा भी किया कि हालात सामान्य होते ही कश्मीरी जनता की मर्ज़ी का सम्मान किया जाएगा। इतिहासकारों के बीच इस वादे को निभाने के तौर-तरीक़ों पर आज भी बहस होती है, लेकिन इतना तय है अगर 26-27 अक्तूबर की वो फ़ौजी कार्रवाई न होती, तो पूरी कश्मीर घाटी पाकिस्तान के क़ब्ज़े में जा चुकी होती।

आख़िर नेहरू ही पहले प्रधानमंत्री क्यों बने?

जवाब कई परतों में है। गांधीजी को यक़ीन था कि आज़ाद भारत को एक ऐसा रहनुमा चाहिए जिसकी सोच आधुनिक हो, जिसे कूटनीति की समझ हो, और जो हर मज़हब के लोगों को एक धागे में पिरो सके गांधी ने नेहरू को अपना राजनैतिक वारिस माना। दूसरी वजह थी जन-स्वीकार्यता किसान, मज़दूर, नौजवान, सब पर नेहरू का जादू सिर चढ़कर बोलता था। तीसरी वजह उनका अंतरराष्ट्रीय क़द था विश्व नेताओं से बराबरी की ज़ुबान में बात करने की सलाहियत, जो एक नवजात मुल्क की विदेश नीति गढ़ने के लिए अनिवार्य थी।

और सबसे बड़ी वजह उनका विज़न। नेहरू ने सिर्फ़ राजनैतिक आज़ादी पर संतोष नहीं किया; उन्होंने Planning Commission, भाखड़ा-नांगल बांध, IIT, AIIMS, BHEL और Atomic Energy Commission जैसी बुनियादें रखीं, जिन पर आज का भारत खड़ा है। सत्रह बरस की सत्ता में उन्होंने ख़ुद को "मुल्क का पहला सेवक" माना, और एक बहुरंगी, बहुधर्मी हिंदुस्तान को टूटने नहीं दिया।

नेहरू की विरासत: उद्योग और संस्थाओं का निर्माता

आज़ादी के बाद जब भारत एक नव-जन्मी, निर्धन मुल्क था, तब नेहरू ने एक बोल्ड विज़न रखा मुल्क को तकनीकी और औद्योगिक रूप से शक्तिशाली बनाना। 1956 में उन्होंने 245 निजी बीमा कंपनियों को मिलाकर Life Insurance Corporation (LIC) की स्थापना की, जिससे आम लोग-बाग को सस्ते और भरोसेमंद बीमा की पहुंच मिली। इसी दशक में उन्होंने Bharat Heavy Electricals Limited (BHEL), Oil and Natural Gas Commission (ONGC), Hindustan Aeronautics Limited (HAL) जैसी विशाल सार्वजनिक उद्यमों की नींव रखी, जो आज भी भारत की रीढ़ हैं। 1950 में IIT Kharagpur की स्थापना के साथ ही उन्होंने यह तय कर दिया कि भारत दुनिया के बेहतरीन इंजीनियर तैयार करेगा। 1956 में AIIMS दिल्ली खुला, जो चिकित्सा विज्ञान का एक मंदिर बन गया। IIMs, NPL (National Physical Laboratory), ISRO की बुनियाद, 1948 में Atomic Energy Commission, और बाद में Bhabha Atomic Research Center ये सब नेहरू के समय की देन हैं। जिस मुल्क के पास दो दशक पहले कुछ नहीं था, उसे नेहरू ने आत्मनिर्भर भारत की तरफ़ बढ़ा दिया। ये संस्थाएं सिर्फ़ नाम नहीं थीं, ये भारत के भविष्य की नींव थीं। इन सार्वजनिक उद्यमों ने न सिर्फ़ भारत की डगमगाती अर्थव्यवस्था को एक ठोस ज़मीन दी, बल्कि लाखों लोगों को रोज़गार भी दिया एक ऐसा दौर जब मुल्क को हर मोर्चे पर नए सिरे से खड़ा होना था।

Hindu Code Bill: नेहरू, अंबेडकर के साथ थे या ख़िलाफ़?

यह सवाल अक्सर उठता है, तो साफ़ जवाब यह है नेहरू बिल के पक्ष में थे, विरोध में नहीं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर, जो उस वक़्त क़ानून मंत्री थे, हिन्दू कोड बिल लेकर आए एक ऐसा प्रस्ताव जो हिन्दू महिलाओं को शादी, तलाक़, गोद लेने और संपत्ति में विरासत के मामलों में बराबरी का हक़ देता। नेहरू ख़ुद इस सुधार के पुरज़ोर समर्थक थे और उन्होंने संसद में यहां तक कह दिया था कि अगर यह बिल पास नहीं हुआ तो वे अपनी सरकार तक दांव पर लगा देंगे।

मगर मुश्किल यह थी कि कांग्रेस के भीतर ही रूढ़िवादी सोच के कई सांसद, और पार्टी के बाहर परंपरावादी तबक़ा, इस बिल के सख़्त ख़िलाफ़ था। बहस लंबी खिंचती गई, और सितंबर 1951 में जब बिल एक बार फिर अटक गया, तो अंबेडकर ने निराश होकर क़ानून मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया अपने इस्तीफ़े में उन्होंने लिखा कि सरकार की सुस्ती से यह बिल "बिना शोक मनाए दफ़्न" हो गया। यहां एक बात ग़ौर करने लायक़ है अंबेडकर ख़ुद मानते थे कि कांग्रेस के तमाम नेताओं में नेहरू ही इस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा ईमानदार थे; उनकी नाराज़गी नेहरू की नीयत से नहीं, सिस्टम की सुस्ती से थी।

1952 के आम चुनाव में जीतने के बाद नेहरू ने वादा निभाया उन्होंने पूरे कोड बिल को चार छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर पेश किया, ताकि विरोध कम हो सके। 1955 से 1956 के बीच Hindu Marriage Act, Hindu Succession Act, Hindu Minority and Guardianship Act और Hindu Adoptions and Maintenance Act। ये चारों क़ानून संसद से पास हो गए। यानी जो सपना अंबेडकर का था, उसे आख़िरकार नेहरू की ज़िद और दृढ़ता ने ही ज़मीन पर उतारा भले ही रास्ता सीधा नहीं, टुकड़ों में तय हुआ।

नेहरू का निजी जीवन और एक अनकही, ग़लत समझी गई कहानी

February 1916 में जवाहरलाल नेहरू का विवाह कमला नेहरू से हुआ एक कश्मीरी व्यापारी परिवार की बेटी, जो उनके पिता मोतीलाल नेहरू की पसंद थी। पिता चाहते थे कि बेटा शादी करके एक सुखी घर बसाए और वकालत करता रहे, मगर तक़दीर को कुछ और मंज़ूर था यही शादी आगे चलकर नेहरू को राजनीति की तरफ़ धकेलने वाले हालात का हिस्सा बनी। 1936 में तपेदिक (टीबी) से कमला नेहरू का देहांत हो गया, तब नेहरू महज़ 46 साल के थे।

बाद के बरसों में नेहरू की सबसे चर्चित और सबसे ज़्यादा उलझी हुई दोस्ती रही Lord Mountbatten की पत्नी Edwina Mountbatten के साथ। दोनों के बीच गहरी भावनात्मक नज़दीकी थी, जो बरसों लंबी चिट्ठियों में दर्ज है। Edwina के निधन (1960) तक यह चिट्ठियों का सिलसिला चलता रहा। इतिहासकार आज तक इस बात पर बहस करते हैं कि यह रिश्ता महज़ गहरी दोस्ती थी या इससे ज़्यादा कुछ पक्के सुबूत किसी दावे का समर्थन नहीं करते, और ख़ुद Lord Mountbatten इस नज़दीकी से वाक़िफ़ और सहज थे। यह क़िस्सा आज भी भारतीय इतिहास के सबसे निजी और सबसे कम समझे गए अध्यायों में से एक है।

एक बात जो अक्सर ग़लत तरीक़े से कही जाती है, उसे भी साफ़ कर देना ज़रूरी है यह धारणा कि नेहरू ने अपनी किसी बहन को "अपने उसूलों के ख़िलाफ़" बताकर राजनीति में आने से रोका, ऐतिहासिक record से मेल नहीं खाती। हक़ीक़त दरअसल इसके उलट है, नेहरू की बड़ी बहन विजयलक्ष्मी पंडित भारत की सबसे साहसी महिला राजनेताओं में गिनी जाती हैं वे संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं, Maharashtra की राज्यपाल रहीं, और सोवियत संघ, अमेरिका व Britain में भारत की ambassador रहीं। नेहरू ने उन्हें रोका नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक और कूटनीतिक पारी को हर मोड़ पर साथ दिया। छोटी बहन कृष्णा हुथीसिंग ज़रूर राजनीति से दूर रहीं, पर यह उनकी अपनी पसंद थी वे एक सफल लेखिका बनीं और अपने भाई पर कई किताबें लिखीं, न कि किसी पारिवारिक पाबंदी की वजह से।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

Q.1 नेहरू ने कुल कितने साल जेल में बिताए?

आज़ादी की लड़ाई के दौरान नेहरू नौ साल से ज़्यादा वक़्त अंग्रेज़ों की जेलों में रहे।

Q.2 गांधीजी का आख़िरी अनशन किसलिए था?

दिल्ली में सांप्रदायिक शांति क़ायम करने और पाकिस्तान को तय रकम (55 करोड़ रुपये) देने के वादे की पासदारी के लिए न कि विभाजन या पाकिस्तान बनाने की मांग के लिए।

Q.3 कश्मीर भारत में कब और कैसे शामिल हुआ?

अक्तूबर 1947 में महाराजा हरि सिंह के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर और उसके फ़ौरन बाद भारतीय सेना की एयरलिफ्ट के ज़रिए श्रीनगर की हिफ़ाज़त के साथ।

Q.4 क्या नेहरू हिन्दू कोड बिल के ख़िलाफ़ थे?

नहीं, नेहरू इस बिल के पक्ष में थे और इसे पास कराने की पुरज़ोर कोशिश करते रहे। बिल का विरोध कांग्रेस के भीतर के रूढ़िवादी सांसदों और बाहर के परंपरावादी तबक़े से आया था।

Q.5 नेहरू की शादी कब और किससे हुई?

फ़रवरी 1916 में कमला नेहरू से, जो एक कश्मीरी व्यापारी परिवार की बेटी थीं। 1936 में तपेदिक से उनका निधन हो गया।

निष्कर्ष: इतिहास को इंसाफ़ चाहिए

लक्ष्मण राव की 'The Philosopher Jawaharlal Nehru' एक बेलाग और प्रामाणिक तस्वीर पेश करती है। नेहरू सिर्फ़ एक सियासतदान नहीं थे वे एक फ़लसफ़ी थे, एक दूरदर्शी राष्ट्र-निर्माता थे। हां, उनकी नीतियों पर बहस हो सकती है, इतिहासकारों के बीच कश्मीर और विभाजन के कुछ पहलुओं पर आज भी असहमति है मगर उन्हें अकेला दोषी ठहराना उस दौर की जटिलता को नज़रअंदाज़ करना है।

जिस आदमी ने अपनी दौलत मुल्क को दे दी, जवानी के बरस जेल में गंवा दिए, और एक कंगाल मुल्क को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में बदल डाला उसे सिर्फ़ आरोपों की ज़बान में याद रखना, इंसाफ़ नहीं, इतिहास से बेवफ़ाई है।

Tags : history of Jawaharlal Nehru, Jawaharlal Nehru and Edwina Mountbatten relationship reality in Hindi.

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