Huen Tsang Travelling Details In History In Hindi

ह्वेनसांग: वह भिक्षु जिसने कानून तोड़कर सच की तलाश में भारत का रुख किया

Huen Tsang Travelling Details In History In Hindi ह्वेनसांग: वह भिक्षु जिसने कानून तोड़कर सच की तलाश में भारत का रुख किया

गोबी के रेगिस्तान की रात। न कोई Guide, न कोई काफ़िला, न लौटने का रास्ता। एक अकेला भिक्षु, पीठ पर लदे ग्रंथों और बचे-खुचे सामान के बीच, अपने घोड़े के सहारे उस साम्राज्य की सरहद पार कर रहा है जिसने उसे देश छोड़ने से साफ़ मना कर दिया था। यह कोई फ़साना नहीं, चीन के तांग सम्राट तैज़ोंग (Taizong) के दौर की एक हक़ीक़त है। भिक्षु का नाम था ह्वेनसांग और उसे न सोने की तलाश थी, न किसी राज्य की, बल्कि सिर्फ़ एक ज़िद थी: सच को उसकी जड़ तक जाकर परखना।

यही ज़िद उसे क़ानून तोड़ने पर मजबूर करती है, गोबी के मरुस्थल और मध्य एशिया के बर्फ़ीले दर्रों से गुज़ारती है, और आख़िरकार भारत की धरती पर ला खड़ा करती है उस भारत में, जो उस वक़्त सम्राट हर्षवर्धन के शासन में अपने बौद्धिक और सांस्कृतिक उभार पर था। पंद्रह बरस बाद जब वह लौटा, तो उसके साथ थीं संस्कृत की सैकड़ों पांडुलिपियाँ, और एक ऐसा यात्रा-वृत्तांत जो आज भी सातवीं सदी के भारत को समझने का सबसे भरोसेमंद दस्तावेज़ माना जाता है।

कौन था यह आदमी, और भारत ही क्यों? (The Man and His Mission)

ह्वेनसांग (आधुनिक चीनी उच्चारण में Xuanzang) का जन्म सन् 602 ईस्वी के आस-पास चीन के हेनान प्रांत में, लूओयांग (Luoyang) के नज़दीक चेनलियू (Chenliu) नामक गाँव में हुआ। उसका असली नाम चेन ह्वे (Chen Hui) था। कोई शाही या रईस ख़ानदान नहीं था बल्कि एक ऐसा घराना था जो पीढ़ियों से विद्वता के लिए जाना जाता था। बचपन से ही उसकी याददाश्त और समझ इतनी तेज़ थी कि तेरह बरस की उम्र में ही उसे भिक्षु बना लिया गया, और बीस की उम्र तक वह पूर्ण रूप से दीक्षित हो चुका था।

भारत आने की वजह किसी तीर्थ-यात्रा जैसी सीधी-सादी नहीं थी। चीन में उस दौर तक बौद्ध धर्म गहरी जड़ें जमा चुका था, मगर जो ग्रंथ चीनी भाषा में मौजूद थे, उनके अनुवादों में इतनी विसंगतियाँ और भटकाव थे कि अलग-अलग संप्रदाय एक ही बात की उलटी-सीधी व्याख्या कर रहे थे। ह्वेनसांग को यह साफ़ लगने लगा अगर असली ज्ञान चाहिए, तो चीनी अनुवादों के भरोसे बैठे रहने का कोई फ़ायदा नहीं, जाना होगा सीधे उस ज़मीन पर, जहाँ से यह सब शुरू हुआ था। उसका लक्ष्य तीन-तरफ़ा था: बौद्ध धर्म के मूल तीर्थ-स्थलों (बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर) के दर्शन, नालंदा जैसे महाविहारों में सीधे भारतीय आचार्यों से शिक्षा, और चीन में उपलब्ध न हो सकने वाले संस्कृत मूल ग्रंथों का संग्रह ताकि लौटकर सही अनुवाद हो सके।

यात्रा की समय-रेखा: कब गया, कब लौटा

629 ईस्वी में, क़रीब सत्ताईस बरस की उम्र में, ह्वेनसांग ने चीन की राजधानी चांगआन (Chang'an) से यह यात्रा शुरू की। सम्राट तैज़ोंग ने उस दौर में नागरिकों के देश से बाहर निकलने पर सख़्त पाबंदी लगा रखी थी, तुर्कों से जंग चल रही थी और सीमाएँ बंद थीं। ह्वेनसांग ने इस पाबंदी की परवाह नहीं की और युमेन दर्रे (Yumen Pass) से गुपचुप निकल गया।

गोबी मरुस्थल और मध्य एशिया के ख़तरनाक रास्तों तुरफ़ान, कूचा, समरकंद से गुज़रते हुए, हिंदूकुश पार करके वह गांधार क्षेत्र (आज का पेशावर, पाकिस्तान) पहुँचा। भारतीय उपमहाद्वीप की सीमा में उसका प्रवेश 630 ईस्वी के आस-पास हुआ। इसके बाद वह लगभग तेरह-चौदह बरस भारत के अलग-अलग हिस्सों में शिक्षा और यात्रा में बिताता है। भारत से रवानगी क़रीब 643 ईस्वी में हुई, और मध्य एशिया के रास्ते वापसी की यह पूरी यात्रा 645 ईस्वी में चांगआन पहुँचकर ख़त्म होती है। कुल मिलाकर सोलह-सत्रह बरस का सफ़र जिसमें से ज़्यादातर हिस्सा भारत को समर्पित रहा।

जब वह लौटा, तो जिस क़ानून को तोड़कर वह निकला था, उसी सम्राट तैज़ोंग ने उसका स्वागत किसी अपराधी की तरह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नायक की तरह किया। ज्ञान की यह जीत उस दौर में भी क़ानून पर भारी पड़ी।

भारत में उसका रास्ता कैसा था

भारत में दाख़िल होने के बाद ह्वेनसांग ने लगभग पूरे उपमहाद्वीप का चक्कर लगाया यह ख़ुद अपने आप में उस दौर के भूगोल का एक अद्भुत नमूना है।

सबसे पहले कश्मीर, जहाँ उसने क़रीब दो बरस संस्कृत और बौद्ध दर्शन का गहन अध्ययन किया। वहाँ से पंजाब होते हुए मथुरा, फिर स्थानीश्वर (आज का थानेसर) और सम्राट हर्षवर्धन की राजधानी कन्नौज। इसके बाद बौद्ध धर्म के पवित्र स्थलों की कड़ी कपिलवस्तु (बुद्ध का जन्मस्थान), श्रावस्ती, कुशीनगर (महापरिनिर्वाण स्थल), सारनाथ (पहला उपदेश) और बोधगया (ज्ञान-प्राप्ति स्थल)।

बोधगया के बाद उसका सबसे लंबा पड़ाव नालंदा महाविहार रहा। वहाँ से आगे बंगाल और असम (कामरूप) तक, जहाँ के राजा भास्करवर्मन उसके बड़े प्रशंसक बने। पूर्वी तट से होते हुए दक्षिण में कांचीपुरम (पल्लव राजवंश की राजधानी) तक, फिर पश्चिम की ओर मुड़कर चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय के अधीन महाराष्ट्र क्षेत्र और गुजरात के वल्लभी तक। अंत में सिंध और पंजाब से होकर वह वापस उत्तर-पश्चिम की सीमा पार कर चीन लौटा।

भारत की धरती और उसका उतार-चढ़ाव

ह्वेनसांग ने अपनी किताब सी-यू-की (Si-Yu-Ki, यानी "पश्चिमी दुनिया का रिकॉर्ड") में भारत के भूगोल का बड़ा जीवंत ब्यौरा दिया है। कन्नौज को उसने एक वैभवशाली, घनी आबादी वाला शहर बताया नदी किनारे बसा, बाग़-बग़ीचों और सरोवरों से भरा। प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा-यमुना के संगम का ज़िक्र वह ख़ास तौर पर करता है।

मगर हर जगह चमक-दमक नहीं थी। कुछ इलाक़े घने जंगलों से भरे थे, जहाँ डाकुओं का भी ख़ौफ़ था ख़ुद ह्वेनसांग को गंगा में नाव-यात्रा के दौरान लुटेरों ने पकड़ लिया था, जो उसे किसी देवी को बलि चढ़ाना चाहते थे; एक अचानक आए तूफ़ान की बदौलत वह बच निकला। और यह भी दर्ज करने लायक़ बात है कि जिन शहरों कपिलवस्तु, श्रावस्ती, कुशीनगर का बौद्ध धर्म में इतना महत्व था, वे उस वक़्त तक बड़े पैमाने पर खंडहर बन चुके थे और वहाँ की आबादी बहुत कम रह गई थी। यानी बौद्ध धर्म का उद्गम-स्थल भले पवित्र बना रहा हो, उसकी रौनक़ तब तक फीकी पड़ चुकी थी।

समाज और रहन-सहन जैसा ह्वेनसांग ने देखा

ह्वेनसांग ने हर्षवर्धन के दौर के भारतीय समाज का एक बहुत ही ईमानदार और सकारात्मक चित्र खींचा है:

लोगों का चरित्र: उसने लिखा कि भारत के लोग स्वभाव से सीधे, ईमानदार और अपने वचन के पक्के हैं, छल-कपट से दूर रहते हैं। समाज में नैतिक मूल्यों का स्तर बहुत ऊँचा था।

समाज की संरचना occupational divisions: सातवीं सदी का भारतीय समाज विभिन्न पेशागत श्रेणियों (occupational categories) में विभाजित था व्यापारी, कारीगर, बढ़ाई, मछुआरे, किसान, कृषि मज़दूर, सेवकगण और अन्य। यह guild-based और occupational system था, जो काम के आधार पर संगठित था। इस दौर में "ब्राह्मण" (Brahmin) के रूप में कोई एक कठोर, well-defined varna class अभी अस्तित्व में नहीं था Brahmin के रूप में एक rigid, hereditary priestly class बाद में, खासकर 8वीं सदी के बाद, solidify हुआ। अभी तक vedic ritual और ज्ञान की परंपरा कुछ परिवारों में preserved थी, पर यह अभी ऐसा कठोर, जन्म-आधारित hierarchy नहीं था जो बाद में उभरी। समाज में occupational mobility भी थी कोई अपना काम और skill के आधार पर अलग category में जा सकता था।

खान-पान और रीति-रिवाज: लोग सादे, बिना सिले सफ़ेद सूती या रेशमी कपड़े पहनते, खाने में दूध, घी, अनाज और फलों की प्रधानता थी। लहसुन-प्याज़ खाने वालों को समाज से बाहर रहना पड़ता था, लगभग अछूत की तरह। अंतर्जातीय विवाह (या inter-occupational विवाह) प्रचलित नहीं थे, और खान-पान को लेकर कुछ नियम थे। यानी जो ईमानदारी और अनुशासन ह्वेनसांग को इतना प्रभावित करता है, वही समाज अपने भीतर एक सख़्त बहिष्करण की व्यवस्था भी रखता था इस विरोधाभास को नज़रअंदाज़ करना इतिहास के साथ बेईमानी होगी।

न्याय व्यवस्था:

अपराध कम थे, मगर राजद्रोह या गंभीर अपराधों की सज़ा में हाथ-पैर काट देना या देश-निकाला आम बात थी। सच का पता लगाने के लिए अग्नि-परीक्षा या जल-परीक्षा (trial by ordeal) जैसी प्रथाएँ भी मौजूद थीं यानी न्याय, तर्क से कम और डर से ज़्यादा चलता था।

बौद्ध धर्म की हालत, और बाक़ी धर्मों की मौजूदगी

सातवीं सदी तक पहुँचते-पहुँचते भारत में बौद्ध धर्म अपने सबसे ऊँचे शिखर से थोड़ा नीचे उतरना शुरू हो चुका था, हालाँकि तब भी वह एक बेहद ताक़तवर और असरदार धर्म था। यह मुख्यतः दो धाराओं में बँटा था हीनयान (स्थाविरवाद) और महायान। ह्वेनसांग ख़ुद महायान का अनुयायी था, और उसने देखा कि कश्मीर व सिंध में हीनयान का बोलबाला था, जबकि मगध और नालंदा में महायान का प्रभाव ज़्यादा था।

सम्राट हर्षवर्धन ने बौद्ध धर्म को बड़ा राजकीय संरक्षण दे रखा था हर पाँच बरस में प्रयाग में एक विशाल मोक्ष-परिषद आयोजित करते, जिसमें वे अपना सब कुछ दान कर देते। कन्नौज में बुलाई गई एक बड़ी धर्मसभा में ह्वेनसांग को मुख्य वक्ता बनाया गया, जहाँ उसने महायान सिद्धांत की व्याख्या इतने प्रभावशाली ढंग से की कि उसे 'महायानदेव' और 'मोक्षदेव' जैसी उपाधियों से नवाज़ा गया।

पर भारत सिर्फ़ बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं था। ह्वेनसांग के विवरण से साफ़ है कि वैदिक या ब्राह्मण परंपरा (जिसे आज व्यापक रूप से हिंदू धर्म कहा जाता है) पुनरुत्थान के दौर में थी उसने कई शहरों में शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा करने वालों को देखा, जिन्हें उसने अपनी शब्दावली में 'देव-पूजक' या 'तीर्थिक' कहा। वाराणसी और प्रयाग जैसे स्थानों पर इन अनुयायियों की तादाद बहुसंख्यक थी। इसके अलावा पूर्वी और दक्षिणी भारत बंगाल और कांचीपुरम जैसे इलाक़ों में उसने दिगंबर जैन भिक्षुओं को भी देखा, जिन्हें उसने 'निर्ग्रंथ' कहा। सबसे उल्लेखनीय बात यह कि धार्मिक कट्टरता के बावजूद समाज में एक हद तक सहिष्णुता मौजूद थी ख़ुद हर्षवर्धन, बौद्ध धर्म की ओर झुकाव रखते हुए भी, सूर्य और शिव की पूजा करते थे।

नालंदा: तथ्य और अफ़वाह के बीच की लक़ीर

ह्वेनसांग की सबसे लंबी और सबसे गहरी संगत नालंदा महाविहार से रही। वहाँ उसने प्रसिद्ध आचार्य शीलभद्र जो उस वक़्त क़रीब एक सौ छह बरस के थे को अपना गुरु बनाया, और योगशास्त्र, न्यायशास्त्र व संस्कृत व्याकरण का इतना गहरा ज्ञान हासिल किया कि वह ख़ुद भारत के शीर्ष विद्वानों में गिना जाने लगा।
ह्वेनसांग की सबसे लंबी और सबसे गहरी संगत नालंदा महाविहार से रही। वहाँ उसने प्रसिद्ध आचार्य शीलभद्र जो उस वक़्त क़रीब एक सौ छह बरस के थे को अपना गुरु बनाया, और योगशास्त्र, न्यायशास्त्र व संस्कृत व्याकरण का इतना गहरा ज्ञान हासिल किया कि वह ख़ुद भारत के शीर्ष विद्वानों में गिना जाने लगा।

नालंदा के आँकड़े 10,000 छात्र और 1,510 शिक्षक ह्वेनसांग ने ख़ुद अपने वृत्तांत में दर्ज किए हैं, और यह आँकड़ा सदियों से हर किताब में दोहराया जाता रहा है। यहाँ एक ज़रूरी बात जोड़नी ज़रूरी है, जो अक्सर छोड़ दी जाती है: कई आधुनिक इतिहासकार और पुरातत्वविद् (जैसे Nalanda: Situating The Great Monastery के लेखक फ्रेडरिक आशर) इन संख्याओं को अतिरंजित मानते हैं। तर्क सीधा है नालंदा के जो खंडहर आज खुदाई में मिले हैं, उनकी भौतिक संरचना इतनी बड़ी आबादी को ठहराने लायक़ नहीं दिखती, और कई इतिहासकारों का अनुमान इसे एक हज़ार से चार हज़ार के बीच रखता है। साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि ह्वेनसांग ने यह वृत्तांत चीन लौटने के बाद, एक ऐसे पाठक-वर्ग के लिए लिखा था जो नालंदा की भव्यता से चमत्कृत होना चाहता था तो आँकड़ों में कुछ बढ़त स्वाभाविक है। संख्या चाहे जो रही हो, यह तय है कि नालंदा उस दौर के सबसे बड़े ज्ञान-केंद्रों में से एक था।

प्रवेश की प्रक्रिया बेहद कठिन थी। मुख्य द्वारों पर 'द्वारपंडित' नाम के विद्वान बैठते, जो प्रवेश चाहने वाले हर छात्र की सख़्त मौखिक परीक्षा लेते कहा जाता है कि दस में से मुश्किल से दो-तीन छात्र ही यह इम्तिहान पार कर पाते थे। पाठ्यक्रम भी सिर्फ़ बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं था बौद्ध ग्रंथों के साथ-साथ वेद, तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा विज्ञान और खगोल विज्ञान भी पढ़ाए जाते थे। ख़र्च चलाने के लिए सम्राट हर्षवर्धन और दूसरे राजाओं ने सैकड़ों गाँवों का राजस्व सीधे इस महाविहार को दान कर रखा था, जिससे छात्रों के लिए शिक्षा, भोजन और आवास पूरी तरह मुफ़्त था।

Huen Tsang लेकर गया ग्रंथ, मूर्तियाँ, और एक जीवन का काम

ह्वेनसांग की यात्रा की असली कमाई किताबें ही थी। पंद्रह बरस की भटकन के बाद, 643-644 ईस्वी में जब वह भारत से रवाना हुआ, तो उसके पास 657 संस्कृत पांडुलिपियाँ थीं। इनमें 224 महायान सूत्र और 67 सर्वास्तिवाद से जुड़े ग्रंथ शामिल थे, बाक़ी हीनयान की अलग-अलग शाखाओं, तर्कशास्त्र, व्याकरण और चिकित्सा से जुड़े ग्रंथों में बँटे हुए थे। इनके अलावा वह सोने, चाँदी और चंदन से बनी बुद्ध की कई मूर्तियाँ और कुछ पवित्र अवशेष भी घोड़ों-हाथियों पर लादकर चीन ले गया।

एक भाषाई ग़लतफ़हमी यहाँ साफ़ कर देना ठीक रहेगा "संस्कृत" कोई सातवीं सदी की नई या अधूरी भाषा नहीं थी। जिस मानक व्याकरण-तंत्र ने संस्कृत को उसका शास्त्रीय रूप दिया। यह परंपरा जिसे दुनिया पाणिनि के नाम से जानती है वह भाषिक प्रमाणों के आधार पर ईसा से क़रीब चार-पाँच सौ बरस पहले का माना जाता है, यानी ह्वेनसांग से क़रीब एक हज़ार बरस पहले। यह साफ़ कर देना ज़रूरी है कि "पाणिनि" नाम के किसी एक व्यक्ति के होने का कोई समकालीन दस्तावेज़ी सबूत नहीं मिलता। दरअसल अशोक के शिलालेखों (तीसरी सदी ईसा-पूर्व) से पहले भारत में शिलालेखी परंपरा ही मौजूद नहीं थी, इसलिए बुद्ध-महावीर समेत उस दौर के किसी भी भारतीय विचारक के लिए ऐसा प्रत्यक्ष सबूत नहीं मिलता। जो मिलता है, वह है भाषा-तंत्र की चरम व्यवस्थितता और कात्यायन के वार्तिक (क़रीब तीसरी सदी ईसा-पूर्व) जैसी नज़दीकी टीका-परंपरा, जो इसे एक ठोस, नामित पूर्ववर्ती रचना मानकर आगे बढ़ती है यह भरोसेमंद अनुमान है, अकाट्य प्रमाण नहीं। बाद की सदियों में जुड़ी बातें जैसे किसी गाँव में मूर्ति देखे जाने या स्थानीय लोगों से सुनी गई बातें महज़ पुरानी ज़िंदा किंवदंतियों के सबूत हैं, तथ्य के नहीं, इसलिए उन्हें इतिहास के तौर पर नहीं लिया गया है। पर इससे अलग और ज़्यादा पुख़्ता बात यह है चाहे इस व्याकरण-तंत्र को किसी एक व्यक्ति ने रचा हो या परंपरा ने सामूहिक रूप से गढ़ा हो, यह तंत्र सदियों से सक्रिय और अध्ययन में था। और जिस देवनागरी लिपि से आज संस्कृत पहचानी जाती है, वह भाषा नहीं बल्कि लिखने का एक ज़रिया भर है, जो कई सदियों बाद व्यापक हुआ उस दौर में संस्कृत ग्रंथ गुप्त या सिद्धम जैसी अलग लिपियों में लिखे जाते थे। हाँ, महावस्तु या ललितविस्तर जैसे कुछ शुरुआती बौद्ध सूत्र प्राकृत-मिश्रित एक साहित्यिक रूप में लिखे गए थे, जिसे आधुनिक भाषाविद "बौद्ध हाइब्रिड संस्कृत" (Buddhist Hybrid Sanskrit) कहते हैं पर ह्वेनसांग नालंदा में जिन ग्रंथों के पीछे गया, यानी वसुबंधु, दिग्नाग और धर्मपाल के योगाचार व न्यायशास्त्र के ग्रंथ, वे उस वक़्त तक मानक संस्कृत में ही रचे जा चुके थे।

चीन पहुँचने के बाद उसने अपने जीवन के आख़िरी उन्नीस बरस (645 से 664 ईस्वी तक) सिर्फ़ एक काम में झोंक दिए इन ग्रंथों का सटीक चीनी अनुवाद। उसने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर 657 में से 75 बड़े ग्रंथों (क़रीब 1,335 अध्यायों) का अनुवाद पूरा किया बाक़ी का काम अधूरा ही रह गया, क्योंकि उम्र और समय दोनों साथ छोड़ गए। फिर भी इतना काम इतना असरदार था कि चीन, जापान और कोरिया में बौद्ध धर्म को एक नई और शुद्ध दिशा मिल गई।

एक चश्मदीद गवाही की क़ीमत

अगर ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा का यह विस्तृत ब्यौरा न लिखा होता, तो सातवीं सदी के भारत ख़ासकर हर्षवर्धन के शासनकाल, नालंदा की भीतरी कार्यप्रणाली, और उस दौर के सामाजिक ताने-बाने का कोई भरोसेमंद लिखित record हमारे पास न होता। यह ग़ौर करने लायक़ बात है कि उससे लगभग चार सौ बरस बाद, ग्यारहवीं सदी में, एक और बाहरी पर्यवेक्षक अलबरूनी भारत आया और उसने भी किताब-उल-हिंद में इसी तरह भारत को बाहरी नज़र से परखा मगर तब तक तस्वीर बहुत बदल चुकी थी, इस्लामी आक्रमणों के बाद का भारत ह्वेनसांग के देखे भारत से कई मायनों में अलग था। दोनों वृत्तांतों को साथ पढ़ने पर भारत के बदलते चेहरे की एक दुर्लभ, बाहरी नज़र से खींची गई तस्वीर उभरती है। जवाहरलाल नेहरू ने भी डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में ऐसे विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों को भारत के इतिहास को समझने के चंद निष्पक्ष स्रोतों में गिना है क्योंकि यह किसी दरबारी की खुशामद नहीं, बल्कि एक बाहरी आदमी की सीधी, बेलाग गवाही है।

ह्वेनसांग महज़ एक भिक्षु नहीं था वह भारत और चीन के बीच का वह सांस्कृतिक पुल था, जिसने अपने कंधों पर सैकड़ों किताबों का बोझ उठाकर, अपनी ज़िंदगी के उन्नीस बरस अनुवाद की मेज़ पर गुज़ारकर, दो सभ्यताओं को एक-दूसरे से मिला दिया। और यह सब सिर्फ़ इसलिए, क्योंकि एक आदमी ने अपने वक़्त के सबसे ताक़तवर सम्राट के हुक्म को नज़रअंदाज़ करके पूछने की हिम्मत की। तो सच आख़िर है क्या?

स्रोत-नोट: इस लेख के लिए ह्वेनसांग के अपने वृत्तांत सी-यू-की, उनके शिष्य ह्वे-ली (Hwui-Li) की लिखी जीवनी, और आधुनिक इतिहासकारों-पुरातत्वविदों (फ्रेडरिक आशर, सुकुमार दत्त सहित) के विश्लेषण को आधार बनाया गया है जानबूझकर किसी धार्मिक ग्रंथ को स्रोत नहीं बनाया गया, क्योंकि यह एक ऐतिहासिक यात्रा-वृत्तांत है, धर्मशास्त्र नहीं। तुलनात्मक संदर्भ के लिए अलबरूनी की किताब-उल-हिंद और नेहरू की डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया का सहारा लिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1. ह्वेनसांग कौन था?

सातवीं सदी का एक चीनी बौद्ध भिक्षु, विद्वान और अनुवादक, जो मूल संस्कृत ग्रंथ हासिल करने भारत आया।

2. ह्वेनसांग भारत कब आया और कितने बरस रहा?

वह क़रीब 630 ईस्वी में भारत पहुँचा और तेरह-चौदह बरस यहाँ रहकर 643-644 ईस्वी में लौटा।

3. ह्वेनसांग की किताब का नाम क्या है?

सी-यू-की (Si-Yu-Ki), यानी "पश्चिमी दुनिया का रिकॉर्ड।"

4. नालंदा में सच में 10,000 छात्र थे?

ह्वेनसांग ने यही आँकड़ा दर्ज किया है, पर कई आधुनिक इतिहासकार इसे अतिरंजित मानते हैं और वास्तविक संख्या कम आँकते हैं।

5. ह्वेनसांग भारत से क्या-क्या लेकर गया?

657 संस्कृत पांडुलिपियाँ, बुद्ध की कई मूर्तियाँ और कुछ पवित्र अवशेष, जिनमें से 75 बड़े ग्रंथों का उसने बाद में चीनी भाषा में अनुवाद किया।

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