Kya Chanakya Kalpnik Patra Hai Chnakya Fact Or Myth चाणक्य: इतिहास या मिथक? एक तथ्य-आधारित पड़ताल

Kya Chanakya Kalpnik Patra Hai Chnakya Fact Or Myth चाणक्य: इतिहास या मिथक? एक तथ्य-आधारित पड़ताल

Kya Chanakya Kalpnik Patra Hai Chnakya Fact Or Myth चाणक्य: इतिहास या मिथक? एक तथ्य-आधारित पड़ता

चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य या विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है, का ऐतिहासिक अस्तित्व विद्वानों के बीच आम तौर पर स्वीकार किया जाता है, हालांकि चाणक्य के ठोस सबूत कहीं देखने को नहीं मिलते, इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि यह एक काल्पनिक चरित्र है।

पहले मुझे भी यही लगता था कि चाणक्य सच में कोई व्यक्ति था, लेकिन जैसे-जैसे चाणक्य के बारे में और अधिक research करता गया, सच अपने आप सामने आता चला गया। इतिहास को हम दो तरीकों से जान सकते हैं उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं, ताड़पत्रों और शिलालेखों से, और देशी-विदेशी समकालीन लिखित पुस्तकों से। जब भी उत्खनन से कोई वस्तु प्राप्त होती है, वह भारत सरकार की संपत्ति होती है, उसकी carbon dating होती है और तथ्य सामने आते हैं।

भारत में देखा जाता है कि जब भी कोई ऐसी ऐतिहासिक वस्तु प्राप्त होती है तो उसे प्रायः रामायण या महाभारत से जोड़कर देखा जाता है। Social media पर उसके बारे में बिना किसी सबूत के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, हड़प्पा कालीन मूर्तियों को महाभारत या रामायण काल में fit कर दिया जाता है।

चाणक्य के बारे में हमें केवल 4th century में मौर्य वंश के काल में पढ़ने को मिलता है। मौर्य वंश का काल 321 BCE से 185 BCE तक है, यानी 136 साल तक मौर्य साम्राज्य फलता-फूलता रहा। कथित तौर पर चंद्रगुप्त मौर्य को सम्राट बनाने का श्रेय चाणक्य को ही जाता है।


                   Facts About Chanakya In Hindi

Fact 1

यदि चाणक्य कोई real character होता तो उसका time duration जरूर पता होता, यानी उसकी exact birth date या death date होनी चाहिए थी, जो कि इतिहास में कहीं भी देखने को नहीं मिलती।

Fact 2

Megasthenes, जो चंद्रगुप्त के दरबार में आया था, उसकी किताब Indica में भी चाणक्य के बारे में कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं मिलता।

Fact 3

Alexander के समय के लेखक Diodorus और Arrian ने भी अपनी किताबों में Hydaspes के युद्ध का वर्णन किया है, लेकिन इनकी किसी भी किताब में किसी काल्पनिक चाणक्य का कोई वर्णन नहीं मिलता।

Fact 4

Buddhist texts जो 3rd century में लिखे गए, जिनमें चंद्रगुप्त मौर्य तथा नंद वंश के मध्य युद्ध का वर्णन है, उनमें भी कहीं चाणक्य का कोई प्रमाण नहीं मिलता। बाद के कुछ Buddhist और Jain ग्रंथों में चाणक्य का उल्लेख जरूर मिलता है, लेकिन वे समकालीन (Contemporary) नहीं हैं। वे घटनाएं मौर्यकाल की सदियों बाद लोककथाओं के रूप में दर्ज की गईं, जो ऐतिहासिक तथ्य कम और धार्मिक-राजनीतिक आख्यान (Mythology) ज्यादा प्रतीत होती हैं।

Fact 5

यह सच है कि अर्थशास्त्र के हर अध्याय के अंत में लेखक खुद को "कौटिल्य" कहता है, और अंतिम श्लोक में "विष्णुगुप्त" नाम से नंद वंश के नाश का श्रेय भी लेता है लेकिन असली सवाल यहीं छिपा है। Oxford के scholars McClish और Olivelle (2013) के अनुसार अर्थशास्त्र का मूल ढांचा बाद में 2nd-3rd century CE में redact यानी संपादित किया गया, और तभी उसमें ये self-referential श्लोक तथा कठोर Brahmanical विचारधारा जोड़ी गई ताकि text को कौटिल्य के नाम से जोड़ा जा सके। यानी सिर्फ नाम का उल्लेख होना इस बात का सबूत नहीं कि वह नाम असली व्यक्ति का है बाद के संपादकों ने भी अपने ग्रंथ को प्रामाणिकता देने के लिए किसी प्रसिद्ध नाम का सहारा लिया हो सकता है, ठीक वैसे ही जैसे आज भी "चाणक्य नीति" के नाम पर नई किताबें लिखी जाती रहती हैं।

Fact 6

मिलिंदपन्हो, जो 1st century BC में लिखी गई, उसमें भी चाणक्य के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती।

Fact 7

यदि चाणक्य ने चंद्रगुप्त को राजगद्दी हासिल करने में सहायता की थी, तो जरूर मौर्य साम्राज्य के अभिलेखों में कथित चाणक्य का अंकन मिलता, जो कि इतिहास में कहीं भी देखने को नहीं मिलता। अशोक के 33 से अधिक शिलालेख मिले हैं। अशोक ने अपने गुरुओं, बौद्ध भिक्षुओं, महामात्रों और पिता-दादा (चंद्रगुप्त/बिंदुसार) के युग की बातों का उल्लेख किया है, लेकिन पूरे भारत में फैले किसी भी शिलालेख में अपने दादा के इतने बड़े "महाअमात्य/गुरु" चाणक्य का एक बार भी नाम नहीं लिया।

Fact 8

आमतौर पर माना जाता है कि चाणक्य, कौटिल्य और विष्णुगुप्त एक ही व्यक्ति के अलग-अलग नाम हैं, और अर्थशास्त्र में भी ये दोनों नाम (कौटिल्य और विष्णुगुप्त) मिलते हैं। लेकिन scholars जैसे Thomas Burrow और Patrick Olivelle बताते हैं कि "विष्णुगुप्त" नाम चाणक्य से जुड़े सबसे शुरुआती ग्रंथों में कहीं नहीं मिलता यह पहचान बाद में जोड़ी गई लगती है। सामान्यतः किसी व्यक्ति के एक से अधिक नाम मिलते-जुलते होते हैं, जैसे श्याम का श्यामू, राम का रामू, विवेक का विक्की लेकिन चाणक्य, कौटिल्य और विष्णुगुप्त में ऐसी कोई भाषिक समानता नहीं है। तीन बिल्कुल अलग-अलग नामों का एक ही व्यक्ति से यूं जुड़ जाना, और उसमें से एक नाम का सदियों बाद अचानक प्रकट होना यह पहचान के गड़बड़ाने या जानबूझकर जोड़े जाने, दोनों की तरफ इशारा करता है।

Fact 9

ऐतिहासिक ग्रंथ: चाणक्य को मुख्य रूप से प्राचीन ग्रंथों से जाना जाता है। उनके द्वारा लिखी गई सबसे महत्वपूर्ण किताब अर्थशास्त्र है, जो देवनागरी लिपि में लिखी गई है। देवनागरी लिपि ब्राह्मी और गुप्त लिपि से विकसित होकर करीब 7वीं-8वीं शताब्दी में आकार लेना शुरू हुई और अपने वर्तमान मानक स्वरूप में 11वीं शताब्दी तक पहुंची यानी मौर्यकाल से सैकड़ों साल बाद। अर्थशास्त्र की जो सबसे पुरानी पांडुलिपि (Manuscript) 1905 में R. Shamasastry को मिली थी, वह दक्षिण भारत की "ग्रन्थ लिपि" में थी, न कि मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में। इसके अलावा, आधुनिक भाषाशास्त्रियों (Linguists) के अनुसार अर्थशास्त्र की संस्कृत शैली मौर्यकालीन न होकर गुप्तकालीन (4th-5th century CE) संस्कृत से मेल खाती है। इसका मतलब यह किताब भी किसी और के द्वारा लिखी गई और चाणक्य का नाम उस पर चिपका दिया गया। यह किताब राज्य-कला, अर्थशास्त्र और सैन्य रणनीति पर एक ग्रंथ है, जो देश चलाने के लिए एकत्रित धन को धार्मिक तरीकों से जुटाने की जानकारी देती है यह उनके अस्तित्व के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में काम नहीं करती।

Fact 10

चाणक्य का उल्लेख कुछ साहित्यिक ग्रंथों में भी मिलता है, जिसमें Vishakhadatta द्वारा रचित नाटक मुद्राराक्षस भी शामिल है, जो उनके जीवन की घटनाओं और चंद्रगुप्त मौर्य के उत्थान में उनकी भूमिका को नाटकीय रूप से प्रस्तुत करता है। यह नाटक मौर्यकाल के सदियों बाद, करीब 4th-5th century CE में लिखा गया माना जाता है, इसलिए यह साहित्यिक संदर्भ भी इसका कोई निश्चित प्रमाण नहीं है।

Fact 11

चाणक्य की किताब अर्थशास्त्र में वर्ण व्यवस्था देखने को मिलती है। अगर 4th century यानी मौर्य साम्राज्य में कहीं वर्ण व्यवस्था होती, तो Mauryan काल के अभिलेखों एवं उस समय के लेखकों की किसी किताब से किसी प्रकार की वर्ण व्यवस्था की जानकारी अवश्य मिलती।

Fact 12

कथित चाणक्य उर्फ कौटिल्य ने अपनी किताबें चाणक्य नीति तथा अर्थशास्त्र मूलतः संस्कृत में लिखी थीं, जिन्हें आगे चलकर हिंदी में अनुवाद किया गया यानी वह संस्कृत का ज्ञान रखता होगा। हम सब जानते हैं कि संस्कृत एवं हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं, और जैसा point 9 में बताया, देवनागरी लिपि करीब 7वीं-8वीं शताब्दी में अस्तित्व में आना शुरू हुई। लेकिन इतिहास में दर्ज है कि मौर्य राजवंश की भाषा प्राकृत थी इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि अशोक ने अपने शिलालेख Greek, Aramaic, खरोष्ठी और ब्राह्मी लिपियों में तथा प्राकृत भाषा में लिखवाए थे। Internet पर कहीं-कहीं संस्कृत भाषा को मौर्यकाल की भाषा बताया जाता है, लेकिन इसका भी कोई मूल स्रोत उपलब्ध नहीं है।

Fact 13

महावंश कथा, जो 5th century CE में श्रीलंका में लिखी गई थी, उसमें जरूर चंद्रगुप्त की कथा देखने को मिलती है जिसमें चाणक्य का जिक्र है, लेकिन यह भी केवल कथा (Legend) ही है।

Fact 14

इतिहासकार Thomas Trautmann ने अपनी किताब Kautilya and the Arthashastra (1971) में अर्थशास्त्र के शब्दों का सांख्यिकीय विश्लेषण (Statistical Word-frequency Analysis) किया था, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अर्थशास्त्र किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं, बल्कि अलग-अलग शताब्दियों में कई लेखकों द्वारा संकलित एक composite text है — यह मेरे point 9 वाले तर्क को सीधा support करता है। हालांकि ईमानदारी से बताना जरूरी है कि Trautmann खुद अपनी उसी किताब में चाणक्य नाम के व्यक्ति की historicity को नहीं नकारते, बल्कि लिखते हैं कि चाणक्य के अस्तित्व पर शक करना कल्पना पर ज्यादा जोर डालने जैसा है। यानी वे text की single-authorship को खारिज करते हैं, पर व्यक्ति के अस्तित्व को नहीं। मेरा तर्क यहां Trautmann से आगे जाता है text भले किसी वास्तविक व्यक्ति के इर्द-गिर्द बुनी परंपरा से शुरू हुआ हो, पर जब तक कोई समकालीन (Contemporary), स्वतंत्र और पुरातात्विक (Archaeological) सबूत सामने नहीं आता, केवल सदियों बाद की legend को "historical proof" नहीं माना जा सकता और यही मापदंड किसी भी अन्य ऐतिहासिक दावे पर भी लागू होना चाहिए।

Fact 15

एक और दिलचस्प चुप्पी: अगर चाणक्य सच में चंद्रगुप्त के समय का मुख्य रणनीतिकार था, तो उसकी अपनी किताब अर्थशास्त्र में सिकंदर (Alexander) के आक्रमण, Seleucus Nicator के साथ हुए युद्ध, संधि, या फिर उस राजनीतिक विवाह-गठबंधन (Marriage Alliance) का कहीं एक शब्द भी जिक्र नहीं मिलता जबकि यह चंद्रगुप्त की विदेश नीति की सबसे बड़ी घटना मानी जाती है। जिस किताब को राज्य-कला और कूटनीति का सबसे बड़ा ग्रंथ बताया जाता है, वह अपने ही समय की सबसे बड़ी कूटनीतिक घटना पर खामोश कैसे रह सकती है? यह चुप्पी इस बात का एक और संकेत है कि यह किताब मौर्यकालीन समकालीन दस्तावेज नहीं, बल्कि बाद की रचना है।

यहां चाणक्य की किताब अर्थशास्त्र के बारे में कुछ चर्चा बेहद जरूरी है। संस्कृत के विद्वान Surendra Kumar Sharma (स्रोत अपुष्ट) ने अपनी किताब "कौटिल्य का अनर्थ शास्त्र" में अर्थशास्त्र किताब की पोल खोलकर रख दी है। अर्थशास्त्र में लिखा है ब्राह्मण का धर्म है अध्यापन, यज्ञ करना-कराना, दान देना और लेना। क्षत्रिय का धर्म है युद्ध करना, पढ़ना, दान देना, शस्त्र-बल से जीवन निर्वाह करना, प्राणियों की रक्षा करना। वैश्य का धर्म है पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, कृषि, पशुपालन, व्यापार। शूद्र का धर्म है द्विजातियों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य जातियों की सेवा करना, कृषि, वार्ता (खेती व पशुपालन), शिल्प, गायन, वादन, चरणभाट आदि। (अर्थशास्त्र chapter 1, sukta 1, shlok 2)

आपको जानकर हैरानी होगी कि बिल्कुल यही श्लोक मनुस्मृति में भी है, मतलब यह कि एक किताब के बहुत से श्लोक अन्य किताबों से लिए गए थे। अब आप ही तय कीजिए कि यह अर्थशास्त्र है या ब्राह्मणवाद है।

इस किताब में यह भी लिखा है कि वर्णसंकर यानी intercast विवाह करना बहुत बड़ा पाप है, और राजा का कर्तव्य है कि अपनी प्रजा को उनकी जाति छोड़कर कोई और काम न करने दे।

आपने पढ़ा होगा कि Greek सम्राट Seleucus Nicator ने अपनी बेटी का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य से किया था जिसे बाद के औपनिवेशिक काल (Colonial Era) में लोकप्रिय रूप से "हेलेना" (Helena) नाम दे दिया गया, हालांकि किसी भी प्राचीन स्रोत में उसका असली नाम दर्ज नहीं मिलता। तो इस हिसाब से तो चंद्रगुप्त वर्णसंकर हो गया। अगर चंद्रगुप्त का गुरु कोई चाणक्य था, तो उसकी बात तो वैसे ही गलत हो गई, और तो और चंद्रगुप्त मौर्य तो दासी-पुत्र था, तथा दासी के पुत्र को उसकी जाति का कर्म छोड़कर चाणक्य जैसे बुद्धिजीवी ने सम्राट कैसे बना दिया।

कथित चाणक्य का सबसे बड़ा rocket science तो यह है कि अगर वर्णसंकर माता-पिता से कोई वर्णसंकर औलाद जन्म लेती है, तो उससे लोक, संसार व समाज का नाश हो जाता है। जबकि science कहती है कि intercast या inter-religion marriage से जो संतान जन्म लेती है, उसे अनुवांशिक बीमारियां होने के chances खत्म हो जाते हैं और कुछ नई खूबियां आने के chances होते हैं। उन्हीं के समय के यात्री Megasthenes ने भी अपनी किताब Indica में भारत को 7 भागों में बांटा, लेकिन यहां भी वर्ण व्यवस्था देखने को नहीं मिलती।

(अर्थशास्त्र ch 1, 4, 8) में कथित चाणक्य लिखता है कि राजा का कर्तव्य है कि वह ब्राह्मण को पुरोहित नियुक्त करे, जैसे गुरु के पीछे शिष्य, पिता के पीछे पुत्र, स्वामी के पीछे भृत्य चलता है, ठीक वैसे ही राजा को ब्राह्मण पुरोहित के पीछे-पीछे चलना चाहिए, टोना-टोटका करवाना चाहिए। साफ-साफ समझ आता है कि फर्जी अर्थशास्त्र किताब किसी और ने काल्पनिक चाणक्य के नाम पर लिखी है।

अगर चाणक्य सच में मौर्य साम्राज्य में पुरोहित होता तो वह साम्राज्य गुलाम बनकर रह जाता, फलता-फूलता न रहता, क्योंकि 8th century के बाद राजाओं ने ऐसी ही फर्जी किताबों को पढ़कर अपने साम्राज्य में पुरोहित रखना शुरू किया और भारत 1000 सालों तक गुलाम बना रहा। इस बात का प्रमाण (अर्थशास्त्र ch 1, 4, 8) से ही मिलता है, जहां बताया जा रहा है कि राजा को पुरोहित की बात मानकर शास्त्रों के अनुसार यज्ञ-हवन करवाने चाहिए, पूजा-पाठ करवाने वाला राजा बिना युद्ध के ही विजयी हो जाता है तथा उसे जटिल वस्तु भी सरलता से प्राप्त हो जाती है। यहां राजा को एक अलग ही पट्टी पढ़ाई जा रही है कि बिना युद्ध किए, फर्जी पूजा-पाठ से भी सब कुछ मिल सकता है।

ब्राह्मणों ने सारा खेल अपने लाभ के लिए खेला, अपने आप को सर्वश्रेष्ठ बताया, दान लेने वाला, बुद्धिमान, राजा के आगे चलकर राजा का अनुसरण करवाने वाला। जब क्षत्रिय राजा थे तो वह राजा के दरबार में पुरोहितगिरी करता था, और जब मुगल आए तो उनका दरबारी बन गया अकबर को पिछले जन्म का मुकुंद ब्राह्मण बताकर अपना भाई बनाया।

कथासरित सागर (11th century) तथा बृहत्कथा मंजरी (11th century) में चाणक्य की कहानी देखने को मिलती है, जहां चाणक्य का जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था और जन्म से ही चाणक्य के पूरे दांत थे। किसी पंडित ने उसके पूरे दांत देखकर कहा कि यह बच्चा तो अजूबा है, आगे चलकर यह राजा बनेगा। चाणक्य के माता-पिता सीधे-साधे ब्राह्मण थे जो नहीं चाहते थे कि उनका बेटा सच में राजा बने। उन्होंने अपने बच्चे के दांत तोड़ दिए ताकि उसके राजा बनने की बात झूठी हो जाए। कुछ और कथाओं में चाणक्य थोड़ा बड़े होने पर अपनी मां के कहने पर खुद अपने ही दांत तोड़ देते हैं। फिर बड़ा होने पर चाणक्य नंद राजा के दरबार में पहुंच जाते हैं, और उसके आगे की story सबको पता है।

अब थोड़ा प्रकाश चाणक्य की दूसरी किताब चाणक्य नीति पर भी डाल देते हैं। चाणक्य नीति जैसी किताब आजकल कोई भी लिख सकता है, उसमें कुछ ऐसा बहुत बड़ा ज्ञान या रहस्य नहीं है, लेकिन उसमें कुछ बातें जरूर follow करने लायक हैं, और ऐसी बातें तो किसी के दादा-दादी यूं ही free में सिखा देते हैं।

Conclusion

चाणक्य के नाम से जुड़ी दोनों किताबें अर्थशास्त्र और चाणक्य नीति अपने मौजूदा रूप में मौर्यकाल के करीब 600-700 वर्ष बाद की मालूम पड़ती हैं, और किसी में भी मौर्यकाल का प्रत्यक्ष अंकन नहीं मिलता। चाणक्य की कहानी किस्से, कहानियों और किंवदंतियों (Legends) से आई है, और ये सभी कहानियां मौर्य साम्राज्य के करीब 600 साल बाद से दर्ज होना शुरू होती हैं। सभी पहलुओं को देखकर यह साबित होता है कि कौटिल्य, विष्णुगुप्त या चाणक्य नाम का कोई ऐसा character history में मौजूद नहीं जिसके सीधे, समकालीन सबूत हों।

आखिर में एक बात समझनी जरूरी है यह सिर्फ चाणक्य तक सीमित मसला नहीं है। भारत में हम अक्सर किसी legend को बिना सवाल किए इतिहास मान लेते हैं, क्योंकि वह किंवदंती हमारी भावनाओं और पहचान से जुड़ी होती है। लेकिन rationalism का पहला नियम यही है कि दावा जितना असाधारण हो, सबूत भी उतना ही मजबूत होना चाहिए (Extraordinary Claims Require Extraordinary Evidence)। चाणक्य को लेकर भी वही तटस्थ, सबूत-आधारित नजरिया अपनाना चाहिए जो हम किसी भी अन्य ऐतिहासिक दावे पर अपनाते हैं न भावना में बहकर, न परंपरा के दबाव में।


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