क्या धर्म सचमुच ज़रूरी है? आस्था और तर्क के बीच का सच
बचपन में बिना समझे किए गए कितने ही धार्मिक कर्मकांड आज, समझदार होने पर, बचकाने लगते हैं। किसी मूर्ति या फोटो के आगे बेवजह महंगा तेल जलाना, न जाने कहां-कहां फल-प्रसाद चढ़ाना, यह सब आज फ़िज़ूल इसलिए लगता है क्योंकि अब धर्म को विज्ञान के तराज़ू पर तोला जा सकता है। बचपन में धर्म हम पर हमारे माता-पिता ने थोपा, उन पर उनके पूर्वजों ने और इसी सिलसिले में धर्म पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे विचारों में उतरता चला गया।
इस दुनिया में सैकड़ों धार्मिक संप्रदाय हैं जिन्हें लोग बिना सवाल किए मान लेते हैं और इसी आंख मूंदने की आदत में अच्छे-बुरे का फ़र्क कहीं पीछे छूट जाता है। जियोर्डानो ब्रूनो को ज़िंदा जला दिया गया, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसने कहा कि ब्रह्मांड अनंत है और सूरज जैसे अनगिनत तारे और भी हो सकते हैं, यह सोच चर्च की किताब से मेल नहीं खाती थी। गैलिलियो की सज़ा भी कम क्रूर नहीं थी — दूरबीन से जो सच उसने देखा, उसे बयां करने की कीमत उसे पूरी ज़िंदगी की नज़रबंदी से चुकानी पड़ी। जब भी विज्ञान ने धर्म की खींची लकीर से बाहर झांकने की कोशिश की, इतिहास गवाह है कि सज़ा हमेशा क्रूर रही है।
धर्म में कुप्रथाएं
भारत में हिंदू धर्म की आड़ में घूंघट प्रथा, जाति व्यवस्था, छुआछूत, सती प्रथा, बाल विवाह और बलि प्रथा जैसी कुरीतियां सदियों तक पनपती रहीं। सिख समुदाय भी सामाजिक बुराइयों से अछूता नहीं — कन्या भ्रूण हत्या, बिगड़ता लिंगानुपात, दहेज प्रथा, जातिगत भेदभाव और नशे की गिरफ़्त इसकी मिसाल हैं। दिलचस्प यह है कि सिख धर्म खुद केवल 'गुरु ग्रंथ साहिब' को जीवित गुरु मानता है और देहधारी गुरुओं की पूजा को सिरे से नकारता है, फिर भी पंजाब में उगे अनगिनत 'डेरे' और स्वघोषित बाबा इसी अंधविश्वास को खाद-पानी दे रहे हैं, यानी कुरीति धर्मग्रंथ से नहीं, धर्म के ठेकेदारों से जन्म लेती है। मुस्लिम समाज में तीन तलाक, हलाला, बहुविवाह, बुर्का प्रथा और बाल विवाह जैसी परंपराएं आज भी सवालों के घेरे में हैं। यहूदी धर्म में खतना, अनुगोत (जहां तलाक केवल पति की मर्ज़ी से संभव है), नैदाह (मासिक धर्म के दौरान स्त्री को सात दिन 'अशुद्ध' मानने की परंपरा) और लेविरेट विवाह जैसी प्रथाएं मौजूद हैं। हर धर्म का बाहरी चोला अलग है, पर भीतर की कहानी एक जैसी — चंद धर्म के ठेकेदारों ने आस्था को हथियार बनाकर स्त्री और समाज दोनों को जकड़े रखा।
तर्क की कसौटी और धर्म की उत्पत्ति
यह कोई इत्तेफ़ाक नहीं कि जिन देशों में धर्म का बोलबाला कम है, वहां सामाजिक कुरीतियां भी उतनी ही कम नज़र आती हैं। Scandinavian देश इसकी जीती-जागती मिसाल हैं, जहां धार्मिकता सबसे कम है, फिर भी वे मानव विकास और खुशहाली सूचकांक में दुनिया में सबसे आगे खड़े हैं। धार्मिक और अधार्मिक व्यक्ति में असल फ़र्क बस इतना है — धार्मिक व्यक्ति एक धर्म को सर्वोच्च मानकर बाकी सबको नकारता है, जबकि अधार्मिक व्यक्ति किसी भी धर्म के आगे सिर नहीं झुकाता। तार्किक सोच वाले लोग धर्म को भी उसी वैज्ञानिक तराज़ू पर तौलते हैं जिस पर वे बाकी हर चीज़ को तौलते हैं। जो सही नहीं लगता, उसके ख़िलाफ़ खड़े होने से नहीं हिचकते, चाहे वह मान्यता कितनी भी पुरानी या पवित्र क्यों न मानी जाती हो।
शायद धर्म की शुरुआत समाज को एकजुट करने और एक सूत्र में पिरोने के लिए हुई होगी। पहले लोग मनमानी करते थे जहां चाहे पेड़ काट देना (झूम खेती इसकी अच्छी मिसाल है), बिना वजह जानवरों का शिकार कर लेना, अपने स्वार्थ के लिए किसी को सताना। इन्हीं कुरीतियों पर लगाम कसने के लिए शायद लोगों को धर्म और आस्था का पाठ पढ़ाया गया होगा ताकि नियमों में बंधकर वे पेड़ काटने, शिकार करने जैसी हरकतों से कतराने लगें।
महिलाओं का शोषण
आस्था की आड़ में महिलाओं का शोषण कोई नई बात नहीं। कभी संतान प्राप्ति के नाम पर, कभी मन की शांति के नाम पर, तो कभी सिर्फ़ श्रद्धा जताने के बहाने महिलाओं को निशाना बनाया गया है। सती प्रथा के नाम पर न जाने कितनी बेगुनाह स्त्रियों को न चाहते हुए भी अपने पति की चिता पर जलना पड़ा। मीराबाई का उदाहरण खुद इस धुंधलेपन की मिसाल है — उनकी मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है। भक्ति-कथाएं कहती हैं, वे मूर्ति में समा गईं, जो वैज्ञानिक रूप से असंभव है; वहीं कुछ आधुनिक स्रोत इसे संस्थागत हिंसा का नतीजा बताते हैं। सच यह है कि किसी भी दावे का ठोस प्रमाण नहीं मिलता और यही दिखाता है कि धार्मिक किंवदंतियों ने इतिहास को कितना धुंधला कर दिया है। यही पैटर्न आज भी चलता है — "16 सोमवार का व्रत करो, अच्छा वर मिलेगा", "शिवलिंग पर दूध चढ़ाओ, अच्छे marks आएंगे।" तर्क की जगह भाग्य पर भरोसा करवाकर महिलाओं और युवतियों को सदियों से इसी चक्र में उलझाए रखा गया है।
धर्म का 'Economics'
दरअसल धर्म एक आस्था-व्यापार मॉडल पर चलता है, जहां लोगों को डर दिखाकर लूटा जाता है। मंदिरों में दान, कर्मकांडों की फ़ीस, यज्ञ-हवन का अलग खर्च — इन्हीं सब से धर्म का धंधा फलता-फूलता रहता है। इसका लाभ बस चंद ख़ास तबकों और बाबाओं तक सिमट जाता है। न जाने कितने बाबाओं ने धर्म के नाम पर कितनी दौलत बटोर ली, जो अगर स्कूल-कॉलेज या रिसर्च में लगती तो देश को कितना फ़ायदा होता। पर आस्था के नाम पर सब आंखें मूंद लेते हैं, क्योंकि इन धर्म के ठेकेदारों को पता है कि दस में से एक की मुराद तो पूरी हो ही जाएगी, और वही एक व्यक्ति दस और लोगों को खींच लाएगा।
क्या धर्म ही शांति और नैतिकता की गारंटी है?
अक्सर तर्क दिया जाता है कि धर्म शांति देता है। पर अगर मंदिर-मस्जिद जाने से सचमुच शांति मिलती, तो यह आस्तिक और नास्तिक दोनों को बराबर मिलनी चाहिए थी, जैसे सूरज-चांद अपनी रोशनी और गर्मी सबके लिए एक जैसी बिखेरते हैं। प्रकृति के नियम सबके लिए एक हैं, तो धर्म के नियम हर किसी के लिए क्यों बदल जाते हैं? सच तो यह है कि यह 'धार्मिक शांति' नहीं, बल्कि एक बनावटी 'मानसिक सुरक्षा' है जो हमें ख़ुद फ़ैसले लेने की ज़िम्मेदारी से बचा ले जाती है। क्या यह शांति, तर्क की कीमत पर ख़रीदी जा रही है?
फिर सवाल उठता है कि अगर आप धार्मिक नहीं, तो क्या नैतिक भी नहीं? असल में नैतिकता धर्म की देन नहीं, यह इंसान होने का गुण है। हम सब बचपन से धार्मिक भले न हों, पर नैतिक ज़रूर होते हैं। बड़े होते-होते स्वार्थ, लालच, द्वेष, प्रेम और घृणा हमारे भीतर घर करने लगते हैं। इतिहास गवाह है, धार्मिक लोगों ने भी दूसरों पर कम अत्याचार नहीं किए।
निष्कर्ष: दीया जलाने से पहले सवाल पूछिए
यह कहना ग़लत होगा कि धर्म ने कुछ नहीं दिया। सामूहिकता, त्योहार, नैतिक कहानियां समाज को जोड़ती रही हैं। सवाल धर्म को मिटाने का नहीं, उसमें घुसे अंधविश्वास को छांटने का है। हमें ख़ुद से पूछना चाहिए। अगली पीढ़ी को हम क्या सौंप रहे हैं? क्या हम उन्हें सवाल पूछना सिखा रहे हैं, या वही पुरानी लकीरें पीटना? यह बताना ज़रूरी है कि एक 'अधार्मिक' या 'नास्तिक' व्यक्ति भी उतना ही नैतिक, दयालु और समाज-हितैषी हो सकता है। धर्म नैतिकता का इकलौता ठेकेदार नहीं है।
कभी फुर्सत में किसी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर खुद से पूछिएगा... जिसे हम इस अनंत ब्रह्मांड का रचयिता कहते हैं, क्या उसे सचमुच हमारे चंद रुपयों, महंगे तेल या पत्थरों पर बहाए जाने वाले दूध की भूख है? क्या कभी किसी पत्थर ने गर्भगृह से बाहर आकर किसी भूखे बच्चे का आंसू पोंछा है? नहीं। क्योंकि आंसू पोंछने के लिए पत्थर के हाथ नहीं, इंसान का संवेदनशील दिल चाहिए। इस अनंत ब्रह्मांड में हमारा कोई दैवीय रखवाला नहीं है, हम अकेले हैं और जब आसमान से कोई बचाने आने वाला नहीं है, तब यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी बन जाती है कि हम एक-दूसरे का हाथ थामें।
यह लेख किसी की आस्था तोड़ने के लिए नहीं लिखा गया, बल्कि इसलिए कि अगला दिया जलाने से पहले ख़ुद से पूछिए यह ईश्वर के लिए है, या डर के लिए? धर्म किसी आसमानी सत्ता की देन नहीं, बल्कि इंसान के उस डर की उपज है जो अनजान को समझ नहीं पाया और समझ की जगह श्रद्धा को चुन लिया। और जिस दिन विज्ञान ने उस अनजान को जान लिया, उस दिन से हर देवता धीरे-धीरे किंवदंती बनता चला गया। हमारा मक़सद धर्म को पूरी तरह मिटाना नहीं, बल्कि उससे जुड़े अंधविश्वास और कुरीतियों को छांटना है ताकि एक तार्किक और प्रबुद्ध समाज बन सके।
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