Pawan Kumar Chandana Biography in Hindi आकाश तक की उड़ान: मेरी अपनी ज़बानी

Pawan Kumar Chandana Biography in Hindi आकाश तक की उड़ान: मेरी अपनी ज़बानी

Pawan Kumar Chandana Biography In Hindi | Who is Pawan Chandana आकाश तक की उड़ान: मेरी अपनी ज़बानी

रात के सवा दो बजे थे। श्रीहरिकोटा के लॉन्च पैड से कुछ ही दूर, Mission Control के अंधेरे कमरे में मैं साँस रोके खड़ा था। 18 जुलाई 2026 की वो सुबह जिसे दुनिया अब Mission Aagaman के नाम से जानती है मेरी ज़िंदगी के किसी भी इम्तिहान से बड़ी थी। चार stages वाला Vikram-1, जिसे मेरी टीम ने सात बरस की मेहनत से गढ़ा था, आग और धुएं का एक स्तंभ छोड़ते हुए आसमान की तरफ़ दहाड़ा। पंद्रह मिनट बस पंद्रह मिनट और mission director की आवाज़ पूरे कमरे में गूंजी: "The Vikram-1 Aagaman mission is a grand success" उस लम्हे मुझे एहसास हुआ कि भारत अब उन देशों में शामिल हो चुका है, जहां अब तक सिर्फ़ अमेरिका और चीन की private companies ही अपने दम पर पहुंच पाई थीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फ़ोन आया, बधाई के दो लफ़्ज़ कहे। कुछ घंटों बाद ख़बर आई कि 450 किलोमीटर की low-earth orbit में हमारे चार customer payloads सही-सलामत बैठ चुके हैं। मगर सच बताऊं, उस पल मेरी आंखों के सामने वो पूरा सफ़र किसी फ़िल्म की रील की तरह घूम गया एक आम मध्यमवर्गीय घर से शुरू होकर यहां तक पहुंचने का सफ़र। चलिए, कहानी को उसकी असली शुरुआत से सुनाता हूं।

Curiocity of a boy from small town / हैदराबाद की गलियों में एक बच्चे की जिज्ञासा

मेरा जन्म 1991 में हैदराबाद में हुआ, तेलंगाना में। घर मध्यमवर्गीय था, ज़्यादा ऐशो-आराम नहीं था, मगर एक चीज़ भरपूर थी सवाल पूछने की आज़ादी। रात के आसमान को घंटों ताकते रहना मेरा शग़ल था वो टिमटिमाते सितारे आख़िर कितनी दूर हैं, वहां तक पहुंचा कैसे जाए? इत्तेफ़ाक़ यह कि जिस विषय से मुझे सबसे ज़्यादा ख़ौफ़ था, वही आगे चलकर मेरी पूरी ज़िंदगी की बुनियाद बना स्कूल में मैथ्स के एक पर्चे में मुझे सौ में से महज़ इक्यावन नंबर मिले थे। नंबर देखकर घबराहट होती थी, यक़ीन मानिए। मगर मेरे पिता ने कभी हौसला टूटने नहीं दिया। उन्होंने मुझे IIT की coaching में भेजा, हर मुश्किल घड़ी में साथ खड़े रहे और धीरे-धीरे वही डर दिलचस्पी में, और दिलचस्पी जुनून में बदल गई।

IIT Kharagpur: जहां ख्वाब को मिली एक शक्ल

2007 में पहली ही कोशिश में मैंने IIT की entrance exam पास कर ली और दाख़िला लिया IIT Kharagpur में। वहां मैंने Mechanical Engineering में B.Tech किया, और फिर Thermal Science and Engineering में M.Tech की dual degree 2012 तक। बहुत से लोगों के लिए IIT में दाख़िला मिलना ही मंज़िल होती है। मेरे लिए ये सिर्फ़ शुरुआत थी। जहां मेरे ज़्यादातर सहपाठी विदेश की मोटी तनख़्वाह वाली नौकरियों की तरफ़ देख रहे थे, मेरा ज़ेहन कहीं और उलझा था — रॉकेट्स में। यहीं वो बुनियाद पड़ी, जिस पर आगे चलकर मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी की इमारत खड़ी की।

ISRO: where an engineer became scientist / जहां एक इंजीनियर ने वैज्ञानिक बनना सीखा

ग्रेजुएशन के बाद corporate जगत के मोटी सैलरी वाले ऑफ़र मेरे सामने थे। मगर दिल तो कहीं और ही बसता था। 2012 में मैं ISRO के Vikram Sarabhai Space Centre, तिरुवनंतपुरम में एक साधारण-सी तनख़्वाह पर वैज्ञानिक के तौर पर शामिल हुआ। यहां मुझे भारत के सबसे भारी rocket, GSLV Mk-III, के S200 solid rocket booster पर काम करने का मौक़ा मिला, और आगे चलकर Small Satellite Launch Vehicle (SSLV) का deputy project manager भी बनाया गया। लगभग छह बरस यही वो दौर था जिसने मुझे rocket design, propulsion systems और किसी बड़े मिशन को सिरे तक पहुंचाने का असली हुनर सिखाया।

Time to Quit  secured job / एक सुरक्षित नौकरी को अलविदा कहने का फ़ैसला

हमारे मुल्क में सरकारी नौकरी को अक्सर सबसे बड़ी मंज़िल समझा जाता है सुरक्षा, इज़्ज़त, स्थिरता, सब कुछ एक साथ। मैं भी वो मंज़िल पा चुका था। मगर 2018 तक आते-आते दुनिया भर का space sector करवट ले रहा था। अमेरिका में SpaceX जैसी private companies launch की लागत घटा रही थीं, और ISRO जैसी सरकारी एजेंसियों के पास अपने राष्ट्रीय मिशनों की इतनी व्यस्तता थी कि commercial satellites को कतार में सालों इंतज़ार करना पड़ता। मेरे पास न कोई business का तजुर्बा था, न investors का कोई नेटवर्क, न ये यक़ीन कि regulatory framework वक़्त रहते बदलेगा या नहीं। बस एक ज़िद थी। जून 2018 में मैंने इस्तीफ़ा दे दिया। एक स्थिर, सम्मानित करियर को छोड़ना यह फ़ैसला बहुतों को पागलपन लगा। शायद वक़्त आ गया है कि हम इस सोच से आगे बढ़ें, जहां 'सेफ़्टी' ही ज़िंदगी की इकलौती कसौटी मानी जाती है।

Foundation of Skyroom Aerospace / Skyroot की नींव और एक cold message की तक़दीर

मैं अकेला नहीं था। मेरे साथ थे मेरे पूर्व सहयोगी नागा भारत डाका IIT Bombay के alumnus जिन्हें मेरे इस विज़न पर उतना ही यक़ीन था जितना मुझे। जून 2018 में हमने हैदराबाद में, महज़ दस लोगों की एक छोटी-सी टीम के साथ, Skyroot Aerospace की नींव रखी। लोग हमारी बातों पर हंसते दो नौजवान बिना करोड़ों-अरबों के सरकारी बजट के rocket कैसे बनाएंगे? मेरे पास सिर्फ़ एक चीज़ थी IIT Kharagpur की alumni directory और एक LinkedIn अकाउंट। मैंने Myntra के founder मुकेश बंसल जो ख़ुद भी उसी कॉलेज के पुराने छात्र थे को एक ठंडा-सा, बेझिझक cold message भेजा, बस एक मुलाक़ात मांगते हुए। उन्होंने भरोसा किया और 1.5 मिलियन डॉलर का seed investment दिया। यहीं से जन्म हुआ हमारे rockets की उस सीरीज़ का, जिसे हमने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में "Vikram" नाम दिया।

Pawan Kumar Chandana Biography in Hindi आकाश तक की उड़ान: मेरी अपनी ज़बानी

A light in the dark / तूफ़ान के बीच एक सहारा

मगर क़िस्मत को शायद एक और इम्तिहान मंज़ूर था। कोविड महामारी ने दुनिया भर की funding जमा दी, ठीक उसी घड़ी जब हमें रफ़्तार की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। उन नाज़ुक दिनों में renewable energy company Greenko के founders आगे आए और हमें डूबने से बचाया। 2020 हमारे लिए संघर्ष और सम्मान, दोनों का साल रहा हमें National Startup Award मिला, मुझे Forbes की 30 Under 30 Asia list में जगह मिली, और 2019 में मैं एक TEDx talk भी दे चुका था "Space Colonization: The Future of Humanity" पर। इसी दौर में हमने Kalam-100 नाम के solid rocket stage का पहला full-duration static test भी पूरा किया, जो आगे चलकर Vikram-1 की रीढ़ बना। हर छोटी जीत यक़ीन को थोड़ा और मज़बूत करती गई कि हम सही राह पर हैं।

PRARAMBH / प्रारंभ: वो सुबह जब इतिहास ने करवट ली

18 नवंबर 2022, सुबह हमारा पहला sub-orbital rocket, Vikram-S, श्रीहरिकोटा से आसमान की तरफ़ उड़ा। मिशन का नाम रखा गया 'Prarambh' यानी शुरुआत। क़रीब 89 किलोमीटर की ऊंचाई, आवाज़ की रफ़्तार से पांच गुना तेज़, बंगाल की खाड़ी में सफलतापूर्वक उतरा। Skyroot अंतरिक्ष तक पहुंचने वाली भारत की पहली private company बन गई। जो सपना मैंने 2018 में इस्तीफ़ा देते वक़्त देखा था, वो महज़ चार बरस में हक़ीक़त बन चुका था।

आसमान से आगे: Vikram-1 और एक नए युग की सुबह

Prarambh के बाद सफ़र थमा नहीं। 2023 की Indian Space Policy ने दरवाज़े और खोल दिए। हमने अक्टूबर 2023 में अपने Hyderabad स्थित MAX-Q headquarters में 22 मीटर लंबा Vikram-1 दुनिया के सामने पेश किया carbon composite से बना, तीन solid stages और एक liquid-engine वाले Orbital Adjustment Module से लैस, जो satellites को उनकी सटीक कक्षा तक "last-mile delivery" जैसी सहूलियत से पहुंचाता है। हमने $51 मिलियन की उस दौर की भारत की सबसे बड़ी deep-tech funding जुटाई, फिर मई 2026 में लॉन्च से चंद हफ़्ते पहले Sherpalo Ventures और सिंगापुर के sovereign wealth fund GIC की अगुवाई में एक और $60 मिलियन का round बंद किया। हमारी टीम बढ़कर लगभग 1000 लोगों की हो गई, पूर्व ISRO प्रमुख डॉ. एस. सोमनाथ ने honorary Chief Technical Advisor की हैसियत से हमारा साथ दिया, और नवंबर 2025 में ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने हमारे नए Infinity Campus का उद्घाटन किया। इसी दौर में Skyroot भारत की पहली space-tech unicorn भी बन गई।

और फिर आया वो दिन 18 जुलाई 2026 जिससे मैंने अपनी यह दास्तान शुरू की थी। ठीक इससे कुछ दिन पहले ISRO के अपने दो PSLV मिशन नाकाम हुए थे, तो यह लॉन्च सिर्फ़ हमारे लिए नहीं, पूरे भारतीय space ecosystem के लिए एक इम्तिहान बन चुका था। Vikram-1 ने 450 किलोमीटर की low-earth orbit में सफलतापूर्वक प्रवेश किया, और भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा ऐसा मुल्क बन गया, जहां किसी private company ने अपने दम पर orbital launch हासिल किया हो।

My vision / मेरा विज़न: आगे की राह

मेरे लिए यह कहानी सिर्फ़ एक rocket लॉन्च करने की नहीं है। मैं चाहता हूं कि एक दिन दुनिया भर की छोटी satellite companies अपना उपग्रह उतनी ही सहूलियत से अंतरिक्ष में भेज सकें, जितनी आसानी से हम एक cab बुक करते हैं कुछ ही हफ़्तों में, अपनी मनचाही कक्षा में। याद रहे, 2014 में भारत में सिर्फ़ एक registered space startup था; आज इनकी तादाद 400 से ज़्यादा है, और इस sector में अब तक 500 मिलियन डॉलर से ज़्यादा का निवेश हो चुका है सिर्फ़ 2025 में ही क़रीब 150 मिलियन डॉलर। मेरा यक़ीन है कि भारत के पास दुनिया के सबसे बेहतरीन engineers हैं बस उन्हें सही मौक़ा और सही मंच चाहिए। मैं भारत को दुनिया का launchpad बनते देखना चाहता हूं, जहां दुनिया भर के मुल्क अपने उपग्रह भेजने के लिए आएं।

Final words / आख़िर में, एक बात

जब मैंने ISRO की सुरक्षित नौकरी छोड़ी थी, तो बहुतों ने कहा यह जोखिम बेवजह है, सरकारी नौकरी से बेहतर कुछ नहीं होता। मगर मेरा मानना है, कामयाबी सिर्फ़ एक अच्छी नौकरी या महफूज़ भविष्य मांगने से नहीं मिलती। कभी-कभी अपनी 'comfort zone' से बाहर निकलकर बड़ा जोखिम उठाना ही असली रास्ता होता है। मैंने बस अपने हिस्से का आसमान चुना था बाक़ी, यह सफ़र ख़ुद बयां कर रहा है।

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