Copenhagen से भारत तक: civic sense के तीन अनकहे पड़ाव (Article on zero civic sense in Hindi)
चलो आज एक अनोखे सफ़र पर चलते हैं। आँखें बंद कीजिए और कल्पना कीजिए कि आप एक ऐसे शहर की सड़क पर टहल रहे हैं, जहाँ हर पाँच मिनट की walk पर एक साफ़-सुथरा, चमकता हुआ public toilet आपका स्वागत करता है। सड़कों पर एक भी गड्ढा नहीं है, गाड़ियाँ बिना किसी horn के शोर के अपनी-अपनी लेन में शांति से अनुशासन के साथ चल रही हैं। अगर आप पैदल सड़क पार करना चाहें, तो zebra crossing पर पैर रखते ही गाड़ियाँ आपके सम्मान में रुक जाती हैं। यहाँ तक कि mall या metro के escalator पर भी लोग एक कतार में, एक तरफ खड़े होते हैं ताकि किसी जल्दीबाज़ी वाले इंसान को रास्ता मिल सके। parks की हरियाली इतनी साफ़ कि मानो अभी-अभी किसी ने उन्हें संवारा हो। और हाँ, अगर आप अपनी खाली plastic की बोतल एक machine में डालते हैं, तो पलटकर वह machine आपको इनाम में कुछ पैसे दे देती है।
यह कोई जादुई परियों की कहानी नहीं है, यह हकीकत है Denmark की राजधानी Copenhagen की।
अब ज़रा अपनी आँखें खोलिए और अपने आस-पास के किसी भी भारतीय शहर के चौराहे को देखिए। आँखों के सामने तैरेंगे कूड़े के विशाल पहाड़, हर नुक्कड़ पर बिखरा कचरा, बदबूदार सार्वजनिक शौचालय जिन्हें देखकर ही लोग सड़क किनारे मुंह फेरकर पेशाब करने को मजबूर हो जाते हैं, और गाड़ियों के horns का ऐसा कानफोड़ू शोर जो आपके घर की बंद खिड़कियों को चीरकर अंदर तक चला आता है। zebra crossing और footpath या तो ढूंढने से नहीं मिलते, या उन पर रेहड़ी-पटरी वालों का कब्ज़ा होता है। train की खिड़की से हाथ बाहर निकालकर railway track पर कचरा फेंकते लोग हमारे यहाँ एक आम दृश्य हैं, जहाँ कभी-कभी तो विभाग के जिम्मेदार कर्मचारी ही सफ़ाई के नाम पर कचरे को उठाकर बाहर फेंकते नज़र आते हैं। किसी दीवार पर लिखा होता है "मंत्रालय", पर लोग उसे "मूत्रालय" समझकर वहीं अपनी सभ्यता का विसर्जन कर देते हैं।
इन दो अलग-अलग दुनिया के दृश्यों को देखकर अक्सर हमारे ज़हन में एक सवाल कौंधता है — क्या Denmark के लोग जन्मजात ही हमसे ज़्यादा सभ्य पैदा हुए थे? क्या हम भारतीयों के जीन्स (Genes) में ही civic sense यानी नागरिक समझ की कोई कमी है?
इसका सीधा और साफ़ जवाब है — बिल्कुल नहीं! नागरिक समझ या civic sense का यह मुद्दा जितना ऊपर से सीधा दिखता है, इसकी जड़ें समाज की तीन ऐसी गहरी और अनकही समस्याओं में धंसी हुई हैं, जिन पर हम अक्सर बात करने से कतराते हैं। आइए, कहानी के पन्नों को पलटते हुए इन तीनों पड़ावों को समझने की कोशिश करते हैं।
पहला पड़ाव: मन के भीतर का मनोविज्ञान
हम अपने drawing room को मंदिर जितना पवित्र मानकर साफ रखते हैं, घर में घुसते ही चप्पल तक बाहर उतरवा देते हैं, लेकिन जैसे ही दहलीज पार करते हैं, हमारा व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। अर्थशास्त्र में इसे "Tragedy of the Commons" कहा जाता है — जब कोई संपत्ति सबकी होती है, सड़क, park, footpath, तो व्यक्तिगत रूप से कोई भी उसकी ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहता। मन में एक तर्क बैठा होता है: "अगर मैं इसे साफ नहीं रखूंगा तो भी क्या फर्क पड़ता है, यह मेरा अकेले का थोड़े ही है।" यही सोच हमें घर का कचरा बेझिझक गली में फेंकने की इजाज़त दे देती है। हमारे लिए "स्वच्छता" सिर्फ अपनी चारदीवारी तक सीमित रह गई है; पूरे देश को हम अपना घर मानते ही नहीं। Copenhagen के park अगर इतने संवरे हुए दिखते हैं, तो इसलिए नहीं कि वहां हर पेड़ का कोई अलग मालिक है — बल्कि इसलिए कि वहां हर नागरिक उसे अपना मानता है। जिस दिन गली भी हमें अपने आंगन जैसी लगने लगेगी, जिस दिन "सार्वजनिक" शब्द "साझा" में बदल जाएगा, उस दिन असली बदलाव शुरू होगा। स्वामित्व की भावना के बिना कोई कानून, कोई नियम काम नहीं करता।
इसी मनोविज्ञान का दूसरा चेहरा है एक सिद्धांत जिसे "Broken Windows Theory" कहा जाता है — यह बताता है कि हमारा व्यवहार हमारे आसपास के वातावरण से कितना गहरा प्रभावित होता है। सिद्धांत कहता है: यदि किसी इमारत की एक खिड़की टूटी हुई है और उसे ठीक नहीं किया जाता, तो लोग मान लेते हैं कि यहां कोई परवाह करने वाला नहीं है, और धीरे-धीरे बाकी खिड़कियां भी तोड़ दी जाती हैं। हमारे यहां इसका सबसे जीता-जागता सबूत उसी "मंत्रालय" वाली दीवार पर टंगा मिल जाएगा, जहां बड़े अक्षरों में लिखा होता है "यहां मूतना मना है, यहां थूकना मना है," और ठीक उसी दीवार के नीचे हम मूतते भी हैं और थूकते भी हैं, मानो वह चेतावनी नहीं, एक चुनौती हो। एक बार कोई व्यक्ति साफ-सुथरी दीवार पर थूक दे और उसे तुरंत साफ न किया जाए, तो वह जगह बाकी सबके लिए "कचरा फेंकने का declared spot" बन जाती है। हम वही करते हैं जो हम दूसरों को करते देखते हैं, न कि वह जो board पर लिखा होता है।
और जब यह सब हमारी आंखों के सामने होता है, तब भी हम अक्सर चुप रह जाते हैं — यह सोचकर कि "मुझे क्या, कोई और बोल देगा।" इसे "Bystander Effect" कहते हैं। हमारी यह चुप्पी नियम तोड़ने वालों को एक तरह की सामाजिक वैधता दे देती है। ambulance को रास्ता न देना, wrong side गाड़ी चलाना, horn बजा-बजाकर दूसरों का चैन छीनना, लोकल train या metro में थूकना और धक्का-मुक्की करना — यह सब उसी शून्य civic sense का विस्तार है, जिसे हम रोज़ देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। जब तक समाज में गलत व्यवहार करने वालों को "असहज" महसूस कराने की सामूहिक इच्छाशक्ति नहीं आएगी, तब तक कानून भी बेअसर रहेंगे। इसके लिए चिल्लाने या लड़ने की ज़रूरत नहीं, बस एक टोकना या एक असहज कर देने वाली नज़र ही काफी होती है।
दूसरा पड़ाव: system और डर का गणित
पर मनोविज्ञान अकेला दोषी नहीं है। हम अक्सर लोगों को कोसते हैं कि उनमें civic sense नहीं है, पर यह भूल जाते हैं कि कई बार system ही सही व्यवहार करना बेहद कठिन बना देता है। अगर किसी व्यक्ति को हाथ में खाली पानी की बोतल लेकर दो किलोमीटर तक चलना पड़े क्योंकि रास्ते में एक भी dustbin नहीं है — जबकि Copenhagen में तो बोतल लौटाने पर पैसे तक वापस मिल जाते हैं — तो एक समय बाद वह हार मान ही लेगा। civic sense सिर्फ willpower से नहीं आता, इसके लिए design और infrastructure चाहिए। जब सही काम करना आसान और गलत काम करना असुविधाजनक बना दिया जाए — जैसे कचरा फेंकने पर तुरंत और बिना किसी अपवाद के जुर्माना — तो व्यवहार अपने आप बदलने लगता है। दिलचस्प बात यह है कि हम भारतीय Dubai या Singapore जाकर नियम नहीं तोड़ते, क्योंकि वहां भारी जुर्माने और जेल का डर असली है। हमारे यहां कानून लागू करने की ढील ही इस असभ्यता को बढ़ावा देती है — डर न कानून का है, न विवेक का।
और यह ढील अकेले नागरिक की कमज़ोरी नहीं, पूरे तंत्र की सांठगांठ है। सारा दोष सरकार पर मढ़ देना भी एक तरह का पलायन है, पर यह भी सच है कि सरकार fund allocate करती है, योजनाएं बनाती है, और ज़मीन तक पहुंचाने वाला तंत्र — वही बाबू, वही ठेकेदार, वही निरीक्षक — रास्ते में ही अपना हिस्सा निकाल लेता है। सफाई के लिए budget पास होता है, ठेका निकलता है, ठेकेदार अपना commission काटता है, निरीक्षक अपनी "fees" लेकर आंखें मूंद लेता है, और अंत में जो काम ज़मीन पर बचता है वह आधा-अधूरा होता है। किसी ने ठीक ही कहा है — "बेहद पतली गली है, वहां कार नहीं जाती, और जहां कार नहीं जाती, वहां सरकार नहीं जाती।" नागरिक जब यह सब रोज़ देखता है, तो उसके मन में एक स्वाभाविक तर्क बैठ जाता है — "जब system ही ईमानदार नहीं, तो मैं अकेला ईमानदार होकर क्या पा लूंगा?" यही वह बिंदु है जहां व्यक्तिगत इच्छाशक्ति की कमी और system की भ्रष्टता एक-दूसरे को खाद-पानी देते हैं।
तीसरा पड़ाव: सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ें
तीसरा पड़ाव सबसे गहरा है, क्योंकि यह हमारे इतिहास और सोच में रचा-बसा है। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि जिन देशों में नदियों को केवल एक नदी माना जाता है, वहां वे कांच की तरह स्वच्छ हैं। इसके विपरीत हम नदियों को "मां" का दर्जा देकर पूजते तो हैं, लेकिन अपनी आस्था और घरों की पूरी गंदगी भी उन्हीं में बहा देते हैं — पूजा-सामग्री, plastic, chemical, यहां तक कि अधजले शव भी। हमारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण न जाने कहां खो गया है। हम प्रतीकों को पूजना जानते हैं, पर उनके अस्तित्व की रक्षा करना भूल जाते हैं। यही विडंबना कपड़ों तक फैली है — विदेश में कोई स्त्री skirt-top, jeans, t-shirt पहन ले तो उसे अभद्रता की नज़र से देखा जाता है, लेकिन भारत में साड़ी में कमर और नाभि दिखने पर हम इसे सभ्यता का प्रमाण मान लेते हैं। सभ्यता को हमने वस्त्र की लंबाई में तौलना सीख लिया, पर सड़क पर दूसरों को रास्ता देने या दीवार साफ रखने में तौलना भूल गए।
असल में यह पूरी गड़बड़ी वैज्ञानिक चेतना की कमी से जुड़ी है। जो समाज तर्क और प्रमाण से ज़्यादा प्रतीक और आस्था को महत्व देता है, वह अपनी नदी को साफ रखने से पहले उसे पूजना सीख जाता है — क्योंकि पूजना आसान है, ज़िम्मेदारी उठाना कठिन। हमने कभी यह नहीं सिखाया कि पवित्रता किसी वस्तु में नहीं, हमारे व्यवहार में होती है। जिस दिन हम यह मान लेंगे कि नदी को "मां" कहना काफी नहीं, उसे साफ रखना ही असली श्रद्धा है, उस दिन आस्था और civic sense के बीच का यह झूठा टकराव खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा। तर्क और श्रद्धा एक-दूसरे की दुश्मन नहीं हैं, बशर्ते हम श्रद्धा को ज़िम्मेदारी से अलग न करें।
इसी ऐतिहासिक चूक का दूसरा नमूना है जाति व्यवस्था। विकसित देशों ने washing machine, shaving machine, construction machine बनाईं, और हमने समाज में धोबी, नाई और मिस्त्री जैसी जातियां बना लीं। जहां बाकी दुनिया ने काम को सरल बनाने के लिए बांटा, हमने इंसानों को ही जातियों में बांट दिया। technology और शिक्षा को आगे बढ़ाने के बजाय हमने जाति, धर्म, मंदिर-मस्जिद को आगे बढ़ाने में अपनी ऊर्जा झोंक दी। साफ-सफाई करना जैसे हमारी शान के खिलाफ हो गया, क्योंकि भारत में सफाई एक नागरिक कर्तव्य नहीं, एक विशेष जाति का बोझ मान लिया गया। हमारा पड़ोसी चीन हमसे महज़ एक साल बाद आज़ाद हुआ था, लेकिन आज वह हमसे कम से कम बीस साल आगे खड़ा है, और हम इस बात से संतुष्ट हो लेते हैं कि चलो, कम से कम पाकिस्तान और बांग्लादेश से तो आगे हैं। चीन, जापान और Singapore जैसे देशों में सफाई और अनुशासन बचपन से सिखाया जाता है, और वहां इसे किसी जाति से जोड़कर नहीं देखा जाता — वहां हर व्यक्ति अपना कचरा खुद manage करता है, किसी और पर निर्भर नहीं रहता। चीन ने सड़कें बनाईं, हमने मंदिर बनाए; चीन ने factory खड़ी की, हमने जाति खड़ी की — यही फ़र्क़ है पचहत्तर सालों की दूरी का।
और यह दूरी स्कूल की कक्षा से शुरू होती है। भारत की शिक्षा प्रणाली प्रैक्टिकल पढ़ाई की अपेक्षा थ्योरी पर कहीं अधिक झुकी हुई है। स्कूलों में civic sense कभी सिखाया ही नहीं जाता, केवल exam-oriented पढ़ाई पर ज़ोर दिया जाता है। जब तक बच्चों को primary classes से ही सभ्यता और moral education की शिक्षा नहीं दी जाएगी, तब तक बड़े होकर वे भी वही दोहराएंगे जो उन्होंने अपने बड़ों को करते देखा। Broken Windows Theory सिर्फ दीवारों तक सीमित नहीं है — यह हमारी कक्षाओं में भी उतनी ही सच है।
उम्मीद की किरण: इंदौर का सबूत
पर यह कोई निराशा की कहानी नहीं है। ऐसा नहीं है कि हम कुछ कर ही नहीं सकते जब सरकार और नागरिक आपस में मिलकर काम करते हैं तो नतीजा साफ दिखता है। स्वच्छ सर्वेक्षण में इंदौर जैसे शहर ने बार-बार top rank हासिल की है, यह दिखाता है कि Copenhagen जैसी दुनिया कोई पश्चिमी विशेषाधिकार नहीं, बल्कि एक ऐसा नतीजा है जिसे कोई भी शहर हासिल कर सकता है जब administration और नागरिक दोनों साथ चलें। यह यह भी दिखाता है कि civic sense कोई genetic खामी नहीं, एक सीखी जाने वाली आदत है — और जो सिखाई जा सकती है, वह बदली भी जा सकती है। social media पर पर्यावरण और साफ-सफाई के quotes share करना बेहद आसान है, पर हकीकत में कचरा न फेंकना, अपना घर-आंगन साफ रखना उतना ही मुश्किल। इंदौर ने बस इतना किया कि नीयत और निरंतरता दोनों को एक साथ पकड़े रखा।
निष्कर्ष: यह project नहीं, संस्कृति है
civic sense कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे स्कूलों में रटाकर या YouTube video बनाकर रातों-रात सुधारा जा सके। यह एक सामाजिक अनुबंध है, जो खुद से शुरू होता है और जिसे हमें हर रोज़ जीना पड़ता है। जब हम यह समझ जाएंगे कि सड़क पर थूकना या गलत तरीके से गाड़ी park करना सीधे तौर पर किसी दूसरे इंसान के अधिकार का हनन है, तभी असली बदलाव शुरू होगा। इसकी शुरुआत उन्हीं तीन पड़ावों पर होनी चाहिए जहां से यह समस्या शुरू हुई थी: मन में, जहां "पराया" को "अपना" मानना सीखा जाए; system में, जहां नियम तोड़ने पर Singapore जैसा असली डर पैदा हो, सिर्फ कागज़ी जुर्माना नहीं; और संस्कृति में, जहां स्कूल बच्चों को सिर्फ exam पास करना नहीं, ज़िम्मेदार नागरिक बनना सिखाएं।
हमने अपनी नदियों को मां कहा और उन्हीं में गंदगी बहाई। अपने काम बांटने की जगह अपने ही लोगों को जातियों में बांट दिया। सभ्यता को कपड़ों की लंबाई में तौलना सीख लिया, पर इंसान के अधिकार में तौलना भूल गए। जिस दिन हम सफाई को किसी जाति का काम नहीं, हर नागरिक का फ़र्ज़ मानेंगे, जिस दिन स्कूल बच्चों को सिर्फ exam पास करना नहीं, ज़िम्मेदार नागरिक बनना सिखाएंगे, उस दिन आज़ादी सिर्फ एक तारीख़ नहीं, एक आदत बन जाएगी। और यह बदलाव किसी सरकार के इंतज़ार में नहीं आएगा — यह हर उस हाथ से शुरू होगा जो कचरा उठाने से पहले यह पूछना बंद कर देगा कि "यह मेरा काम क्यों है?"
शायद असली आज़ादी का मतलब यही है कि हम अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से लें। हमने संविधान से समानता, स्वतंत्रता और न्याय के अधिकार तो मांग लिए, पर उनके साथ जुड़े दायित्वों को कभी अपना नहीं माना। एक ज़िम्मेदार नागरिक होना कोई अतिरिक्त गुण नहीं, नागरिकता की न्यूनतम शर्त है। शायद वह दिन दूर नहीं जब भारत की किसी सड़क पर चलने के लिए भी हमें आंखें बंद करके Copenhagen की कल्पना नहीं करनी पड़ेगी — बस आंखें खोलकर देखना ही काफी होगा।
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