सरकारी नौकरी: इज़्ज़त, सुरक्षा और टूटते सपनों की कहानी सरकारी नौकरी ये दो शब्द सुनते ही न जाने कितने सपने, कितनी दुआएं और कितनी उम्मीदें एक साथ जाग उठती हैं। किसी को इसमें सुकून दिखता है, किसी को इज्जत, किसी को घर की तंगी से मुक्ति, किसी को सरकारी चाय चाहिए, और किसी को बस यह साबित करना है कि वो भी कुछ कर सकता है। कारण अलग-अलग हैं मंज़िल एक। सरकारी नौकरी। एक सरकारी ठप्पे की चाह में आज का नौजवान खुद को किस हद तक तपाता है, ये कोई उससे पूछे। 6 से 8 घंटे की कमरतोड़ पढ़ाई, भोर में उठकर मीलों दौड़ना, हाई जंप-लॉन्ग जंप की मशक्कत सपनों को साधने के लिए जवानी के सुख-चैन, दोस्ती-यारी और न जाने कितनी छोटी-छोटी खुशियों की आहुति देनी पड़ती है। इस संघर्ष का एक और डरावना पहलू है सपनों का बाजारीकरण। देश के छोटे-छोटे कस्बों से निकलने वाले युवाओं की इस मजबूरी को दिल्ली, प्रयागराज या इंदौर जैसे शहरों के चमचमाते coaching centres ने एक बड़ा धंधा बना लिया है। इन सपनों का आधार-शिविर बन गई हैं कुछ खास जगहें दिल्ली का मुखर्जी नगर, प्रयागराज की रेलवे लाइन के उस पार की दुनिया, कोटा की संकरी गलियाँ। यहाँ की दीवारें...
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