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सरकारी नौकरी: इज़्ज़त, सुरक्षा और टूटते सपनों की कहानी

सरकारी नौकरी: इज़्ज़त, सुरक्षा और टूटते सपनों की कहानी सरकारी नौकरी ये दो शब्द सुनते ही न जाने कितने सपने, कितनी दुआएं और कितनी उम्मीदें एक साथ जाग उठती हैं। किसी को इसमें सुकून दिखता है, किसी को इज्जत, किसी को घर की तंगी से मुक्ति, किसी को सरकारी चाय चाहिए, और किसी को बस यह साबित करना है कि वो भी कुछ कर सकता है। कारण अलग-अलग हैं मंज़िल एक। सरकारी नौकरी। एक सरकारी ठप्पे की चाह में आज का नौजवान खुद को किस हद तक तपाता है, ये कोई उससे पूछे। 6 से 8 घंटे की कमरतोड़ पढ़ाई, भोर में उठकर मीलों दौड़ना, हाई जंप-लॉन्ग जंप की मशक्कत सपनों को साधने के लिए जवानी के सुख-चैन, दोस्ती-यारी और न जाने कितनी छोटी-छोटी खुशियों की आहुति देनी पड़ती है। इस संघर्ष का एक और डरावना पहलू है सपनों का बाजारीकरण। देश के छोटे-छोटे कस्बों से निकलने वाले युवाओं की इस मजबूरी को दिल्ली, प्रयागराज या इंदौर जैसे शहरों के चमचमाते coaching centres ने एक बड़ा धंधा बना लिया है। इन सपनों का आधार-शिविर बन गई हैं कुछ खास जगहें दिल्ली का मुखर्जी नगर, प्रयागराज की रेलवे लाइन के उस पार की दुनिया, कोटा की संकरी गलियाँ। यहाँ की दीवारें...

How and Where did buddha attain Nirvana (Enlightenment) बुद्ध ने निर्वाण कैसे और कहां प्राप्त किया

How and Where did buddha attain Nirvana (Enlightenment) बुद्ध ने निर्वाण कैसे और कहां प्राप्त किया आम  धारणा है कि सिद्धार्थ ने केवल एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर ज्ञान प्राप्त कर लिया। पहली नज़र में यह बात थोड़ी अव्यावहारिक लगती है। वास्तव में, बुद्ध का ज्ञान केवल एक स्थान पर बैठने से नहीं, बल्कि निरंतर की गई यात्राओं, विविध अनुभवों और समाज के गहरे अवलोकन से उपजा था। यात्राएं हमें जीवन के वास्तविक रंग दिखाती हैं। अलग-अलग लोग, संस्कृतियां, खान-पान और विपरीत परिस्थितियां हमारे दृष्टिकोण को व्यापक बनाती हैं। रोहिणी नदी के पानी के लिए कोहली एवं शाक्य संघ बीच विवाद था तथा शाक्य संघ के फैसले के कारण बुद्ध को उनके समय में अपने घर से निकल जाने की सजा मिली थी। इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। ऐतिहासिक संदर्भों में देखें तो सिद्धार्थ का गृहत्याग यानी महाभिनिष्क्रमण महज़ एक घटना नहीं, बल्कि सत्य की खोज का एक सचेत निर्णय था। वे दिनभर घूमते, समाज के हर वर्ग से मिलते, उनके दुखों को समझते और शाम को थककर किसी वृक्ष की छाया में विश्राम करते। यही कारण है कि उनके जीवन में वृक्ष (बोधिवृक्ष) और ...